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अब न आयेगी बेटियां

Posted On: 7 Jun, 2013 में

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बेटियों पे कब तलक बस यूँ ही लिखते जाओगे,
कब हकीकत की जमीं पर आ के उन्हें बचाओगे…
क्यों नहीं उठते हाथ और क्यों न करते सर कलम,
और कितनी दामिनीयों के लिए मोमबतियां जलाओगे…
आज कहते हो की प्यारी होती है सब बेटियां,
खुद मगर कब बेटों की चाह से निजात पाओगे…
जानवर से इंसान बना और फिर भी रहा जानवर,
जिस्म मानव का है पर कब इंसानी रूह लाओगे…

Candle-March

छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां,
इस जमीं को कब उसके चलने लायक बनाओगे…
देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी ,
ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे…
निकली थी बेख़ौफ़ सी घर से वोह जीने जिंदगी,
लुट गयी अब कैसे उसे जीने की राह दिखाओगे…
अपनी बेटी बेटी है, औरों  की बेटी माल है,
कब तलक ये दोहरा चेहरा अपनों से छुपाओगे…
अब न आयेगी कभी इस जमीं पर बेटियां,
अपनेपन ममता को एक दिन तरस जाओगे…

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370 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pedro के द्वारा
January 12, 2014

Superbly illiaunmting data here, thanks!

Anil Kumar Adhana के द्वारा
June 21, 2013

मन को छू लेने वाले शब्दों का एक समूह , अन्दर तक हिला कर रख दिया ा इतनी सुन्दर रचना के लिए आप बधाई के पात्र हैं ा

    roshni के द्वारा
    June 21, 2013

    अनिल कुमार जी धनयवाद रचना की गहराई को समझने के लिए … आपका तहे दिल से शुक्रिया

yogi sarswat के द्वारा
June 17, 2013

छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां, इस जमीं को कब उसके चलने लायक बनाओगे… देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी , ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे… निकली थी बेख़ौफ़ सी घर से वोह जीने जिंदगी, लुट गयी अब कैसे उसे जीने की राह दिखाओगे… अपनी बेटी बेटी है, औरों की बेटी माल है, कडवे लेकिन यथार्थ शब्द लिखे हैं आपने रोशनी जी ! शायद कुछ लोगों को इससे कुछ सीख मिले

    roshni के द्वारा
    June 21, 2013

    namskar योगी जी लोग सिख कम ही लेते है … मानसिकता ही ऐसी हो गयी है सबकी jis दिन सब की बहिन बेटियां एक जैसी लगनी shuru hogi usi दिन ये सब खतम hoga .. आपके विचरों के लिए हार्दिक आभार

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 15, 2013

छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां, इस जमीं को कब उसके चलने लायक बनाओगे… देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी , ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे बहुत सुन्दर भाव और सुन्दर सन्देश …रौशनी जी बड़ी चिंता का विषय तो है ही …इतना लचीला कानून सब जानते हुए भी इन्साफ मांगते थक हार लोग विदा हो जाते हैं .. सुन्दर रचना भ्रमर ५

    roshni के द्वारा
    June 21, 2013

    namskar Shukla ji yahi तो अफ़सोस की बात है की इन्साफ अब मुश्किल ही नहीं न मुमकिन सा है … अदालते वकील जज न जाने क्यों बनाये गए है रचना पर आपके विचारों के लिए हार्दिक आभार

alkargupta1 के द्वारा
June 13, 2013

रोशनी जी , “देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी , ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे… निकली थी बेख़ौफ़ सी घर से वोह जीने जिंदगी, लुट गयी अब कैसे उसे जीने की राह दिखाओगे…” देश के कटु सत्य को बयां करती भावपूर्ण रचना

    roshni के द्वारा
    June 13, 2013

    आ० अलका जी नमस्कार ये कड़वा सच ही आज हर के लिए शर्म का कारन है .. मुजरिम बच जाता है बेगुनाह या मर जाता है ये धीरे धीरे हर जाता है … आपके अमुल्य विचारों के लिए आभार

bhagwanbabu के द्वारा
June 13, 2013

सुन्दर अभिव्यक्ति….

    roshni के द्वारा
    June 13, 2013

    धन्यवाद भगवान बाबु जी

    Simbarashe के द्वारा
    January 12, 2014

    The hoestny of your posting is there for all to see

    Liberty के द्वारा
    July 12, 2016

    Mooi! Ik zou ook nog es moeten beginnen met naaien… Pfff, mijn zin is lang weegweegst maar nu ik deze mooie rokjes zie, is ie weer helemaal terug!

arunsoniuldan के द्वारा
June 13, 2013

आदरणीय , छु रही है आसमां आज की सब लड़कियां, इस जमीं को कब उसके चलने लायक बनाओगे…बहुत ही सामयिक प्रश्न उठाया है आपने ।

    roshni के द्वारा
    June 13, 2013

    धन्यवाद अरुण जी यही तो दुःख की बात है आज असमान छुने की बात हर कोई करता है , मगर ये धरती को रहने लायक नहीं बना पता.. लड़कियों के लिए आज भी असमान छुना शायद आसान है मगर इस जमी पर रहना उतना ही मुश्किल … विचारों के लिए आभार

rashmisri के द्वारा
June 12, 2013

रौशनी जी ,सब से सुन्दर उपहार जो इश्वर ने दिया उसे हम सहेज नहीं पा रहे हैं !शर्म आती है अपने पर और अपने समाज पर !

    roshni के द्वारा
    June 13, 2013

    रश्मि जी सही कहा आपने .. अपने हाथों ही बहुमूल्य को खो रहे है आपके विचारों के लिए बहुत बहुत आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2013

बेटियों पे कब तलक बस यूँ ही लिखते जाओगे, कब हकीकत की जमीं पर आ के उन्हें बचाओगे… क्यों नहीं उठते हाथ और क्यों न करते सर कलम, और कितनी दामिनीयों के लिए मोमबतियां जलाओगे… स्नेही रोशनी जी जज्बातों को झकोर कर रख देने वाली रचना हेतु सादर बधाई

    roshni के द्वारा
    June 13, 2013

    नमस्कार चाचा जी आपके स्नेह और आशीर्वाद के लिए आभार

priti के द्वारा
June 11, 2013

आज कहते हो की प्यारी होती है सब बेटियां, खुद मगर कब बेटों की चाह से निजात पाओगे… जानवर से इंसान बना और फिर भी रहा जानवर, जिस्म मानव का है पर कब इंसानी रूह लाओगे… बहुत सुन्दर ! रौशनी ,दिल को छू लेने वाली रचना के लिए हार्दिक बधाई !

    roshni के द्वारा
    June 12, 2013

    प्रीति जी नमस्कार आज हर तरफ बेटी प्यारी है ये है अनमोल है मगर फिर भी बेटे की चाह क्या किसी ने आज तक त्यागी है? .. बस सब कहने भर की बाते है दोगलापन है … रचना की तारीफ के लिए शुर्किया आभार

    roshni के द्वारा
    June 11, 2013

    शालिनी जी नमस्कार प्रशंसा के लिए आभार

chaatak के द्वारा
June 10, 2013

देखो क्या उसूल है मुजरिम की भी होती पैरवी , ऐसे माहौल में तो बस मुजरिम बढ़ाते जाओगे… दो पंक्तियों में समस्या का कारण और हल दोनों है फिर भी अंधे देश को कुछ नहीं दिखता और जिसे दिखता है वो कुछ कर नहीं सकता| अच्छे लेखन पर हार्दिक बधाई!

    roshni के द्वारा
    June 11, 2013

    चातक जी नमस्कार यही तो दुःख है मुजरिम को इस तरह ट्रीट किया जाता है जैसे उससे अनमोल कोई हो ही नहीं .. यही नहीं बाकयदा सरकारी वकील दिए जाते है .. क्यों भला आखिर ? जब जुर्म साबित है सबके सामने हुआ है मुजरिम बी सामने है तो उसकी पैरवी क्यों … अँधा कानून और अंधे हो गए है सब आपकी कीमती राय के लिए आभार

allrounder के द्वारा
June 8, 2013

नमस्कार रौशनी जी… हमेशा की तरह इस बार आपने थोडा लीक से हटकर लिखने का प्रयास किया है …. और समाज मैं आज महिलाओं के प्रति जो खौफजदा माहौल बना है उस पर अपनी सुद्रण लेखनी चलाई है …. और अपने कुशल लेखन से समाज को एक सन्देश देती रचना देकर अपने लेखन धर्म का पालन किया है इसके लिए आप प्रशंशा की पात्र हैं !

    roshni के द्वारा
    June 11, 2013

    सचिन जी तारीफ के लिए शुक्रिया … आज का माहौल तो बद से बदतर होता जा रहा है .. ऐसे में भी कोई सख्त करवाई की ही नहीं जा रही .. न जाने क्या होगा इस समाज का .. आभार

Kr. Vishal के द्वारा
June 7, 2013

रौशनी जी हमेसा कि तरह एक महत्वपूर्ण विषय को केन्द्र में रख कर लिखी गयी कविता या फिर ये कहे कि एक कविता के माध्यम से आज समाज में बेटियों के प्रति व्याप्त स्थिति पर कवि ह्रदय से निकली रोष के शब्द. बहुत ही सही चित्रण किया है आपने पर समाज में बेटियों का एक और रूप भी है और जब तक वो रूप है तभी तक इस ब्रहमांड का अस्तित्व है.   ॉजीवन यदि संगीत है तो सरगम ही बेटी , रिश्तो के कानन में भटके इन्सान की मधुबन सी मुस्कान ही बेटी, जनक की फूलवारी में कभी प्रीत की क्यारी में , रंग और सुगंध का महका गुलबाग ही बेटी , त्याग और स्नेह की सूरत है , दया और रिश्तो की मूरत ही बेटी , कण – कण है कोमल सुंदर अनूप है बेटी , ह्रदय की लकीरो का सच्चा रूप है है बेटी , अनुनय , विनय , अनुराग है बेटी , इस वसुधा और रीत और प्रीत का राग है बेटी , माता – पिता के मन का वंदन है बेटी , भाई के ललाट का चंदन है बेटी ।

    roshni के द्वारा
    June 8, 2013

    विशाल जी आपकी सकरात्मक टिप्पणी और कविता में छुपे रोष को अच्छे से समझने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया इसी तरह अपने विचारों से अवगत करते रहियेग आभार

nishamittal के द्वारा
June 7, 2013

सदा की तरह एक और सार्थक प्रसुतुई रौशनी बधाई

    roshni के द्वारा
    June 8, 2013

    निशा जी नमस्कार हमेशा की तरह प्रोत्सहन के लिए आभार

Sumit के द्वारा
June 7, 2013

बहुत ही सुंदर रचना ….रौशनी जी

    roshni के द्वारा
    June 8, 2013

    धन्यवाद सुमित जी आभार


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