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राष्ट्र गान या गुलामी का गीत ( जन गण मन की कहानी)

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सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ”

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा,तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले “वन्दे मातरम”।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है,और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे,जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर।

जय हिंद |
(ये कहानी मुझे ईमेल से श्रीमान योगेश जी द्वारा मिली .. मुझे लगा की ये जानकारी हम सब को होनी चाहिए इसलिए अपने junction दोस्तों के साथ साँझा कर रही हूँ … आप के पास भी अगर कोई जानकारी हो तो यहाँ जरुर दे )
आभार

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74 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Avadhut के द्वारा
June 29, 2012

रोश्निजी, आतिउत्तम! भगवान करे आपकी लेखनी को और ताकत मिले. आपने तो मेरी आखें खोल दी. मज़ा आगया / अनंत साधुवाद !!

narayan sahni के द्वारा
December 29, 2011

बहुत अचछा

maninder के द्वारा
December 7, 2011

कुछ भी कहिये देश के विभाजन के लिए अंग्रेज जिन्हा कांग्रेस नेहरु गाँधी जिम्मेदार थे अंग्रेजो के भारत आने से पहले जैसे भी हालत थे देश में परन्तु अंग्रेजो के विरुद्ध सभी भारत वासी मिलजुल कर लड़े तभी देश आजाद हुआ पर कुछ लोगो ने अपनी तुछ इच्या पूर्ति के लिए और देश की सता हासिल करने के लिए देश का विभाजन कर दिया आप गाँधी को अंग्रेजो के विरुद्ध बता रहे है उहोने तो व्ही फेसले लिए जिस से की कांग्रेस की देश पर पकड़ बनी रहे यह उलेखनिए है की कांग्रेस ने १९३० में पूरण सवराज की मांग उठाई जब उन्हें देश की बागडोर क्रांतिकरिओ के हाथो में जाती दिखी

dinesh aastik के द्वारा
November 25, 2011

प्रिय रोशनी जी, मैं आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। किन्तु अब इस तरह के मुद्दे उठाने से कोई लाभ नहीं, अपितु इससे अनेक तरह की समस्यायें पैदा हो सकी हैं। हमें इन विषयों को भूल कर आज की ज्वलंत मस्याओं पर विचार करना  चाहिये।क्योंकि जो हो चुका अब वह हमारे हाथ नहीं है। हाँ अब ऐसा कुछ न हो कि आगे की पीढियाँ सवाल  उठायें। मेरे सीमित ज्ञान के अनुसार काँग्रेस एवं नेहरू जी ने ऐसी अनेक गल्तियाँ की हैं, जिसका दुष्परिणाम  हमें आज भुगतना पढ रहा है। हम सभी जानते हैं कि देश के बटवारे का प्रमुख कारण नेहरू जी एवं जिन्ना जी  की प्रधानमंत्री पद की महत्वंकाक्षा थी।

Ramesh Tiwari के द्वारा
November 24, 2011

Dear Roshani I have no word to say anything about your article on Jagran Junction only thanks .. thanks..thanks a lot of and hope you will write many this type article in future and open black cover from truth again thanks…. Ramesh Tiwar

    Bijendra Singh के द्वारा
    November 24, 2011

    dftuy

rakeshmishra के द्वारा
November 23, 2011

मैडम आधी – अधूरी जानकारी के साथ आपने वन्दे मातरम पर जबरदस्ती सुनहरा मुलम्मा चढ़ा दिया . यही मुद्दे का भगवाकरण है . आशा है आगे के आर्टिकल्स में आप इतिहास के साथ न्याय करेंगी . आपका कहना सही है लेकिन विवेचन तथ्यपरक नहीं है.. कृपया ध्यान दें इस प्रकार के विवेचन से सिर्फ पारस्परिक वैमनस्य ही बढ़ता है. इतिहास के साथ सबसे बड़ा न्याय यही रहेगा की सारी पुस्तकें जला दी जाएँ. हिन्दुओं और मुस्लिमों के बारे में अगर आपका लेखन है तो शायद साथ रहते हुए ४०० साल से ज्यादा हो चुके हैं. यदि आप कहते हैं की “जन-गण-मन” को आजाद भारत की पहली सरकार ने स्वीकार किया था तो मेरा अनुरोध बस यही है की यह मान के चलिए की आजाद भारत की पहली सरकार अंग्रेजों ( मुलाजिमों और चाटुकारों के साथ तत्कालीन विश्वराज -नीति ) के प्रभाव में गठित हुई. यह फैसला जन सामान्य का नहीं था. लेकिन क्या आपको आश्चर्यजनक नहीं लगता की यह आज तक कायम क्यों है? इसकी वजह भगवा ब्रिगेड है.

    Ramesh Tiwari के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिये राकेश सचाई कडवी होती है हज़म करना सीखो देश की बर्बादी की वजह नेहरु ही है कश्मीर मुदा चीनी सीमा हिन्दू मुस्लिम और कुछ जानना चाहते हो जवाहर के बारे मे ये सरे मुड़े नेहरु ने दिए है , बस एक सब्द मिल गया भगवाकरण उशी की पीछे पद गए —–यह आज तक कायम क्यों है क्योकि आप जैसे लोग हर sach के पीछे जिसे गाधी परिवार नहीं पसंद करता भगवाकरण दिखाई पड़ता है महगाई भ्रस्टाचार बरोज गारी इसके पीछे भी भगवाकरण है क्यों जागो जागो ……..

Baijnath Pandey के द्वारा
November 22, 2011

रौशनी जी, नमस्कार | इस मुद्दे को कई बार सामने लाया गया किन्तु शायद हम अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो गए हैं तभी तो बहुमत से चुने जाने वाले नेता भी वही काम करते हैं हैं जिससे देश की मर्यादा को धक्का पहुँचता हो | आज अपने देश मे सबसे कमी है to आत्मसम्मान की | दुनिया का छोटा से छोटा अथवा पिछड़ा से पिछड़ा देश भी अपने राष्ट्रगान का ऐसा होना बर्दाश्त नहीं कर सकता | आपको अच्छे आलेख के लिए बाधाई | कृपया ऐसे ही लिखते रहें | असत्य को हमेशा हारना पड़ता है, चाहे कितनी देर क्यूँ न हो | हर युग मे ऐसा हुआ है, फिर ऐसा हिन होगा | वंदे मातरम |

dinesh aastik के द्वारा
November 21, 2011

यह सच है कि भारत की वास्तविक जनता को आजादी प्राप्त नहीं हुई है। 15अगस्त1947 को तो केवल हमारे नेता आजाद हुये थे। 

charchit chittransh के द्वारा
November 20, 2011

रोशनीजी; बहुत ही अच्छे तथ्य प्रस्तुत किये हैं आपने ! आपको एवं प्रेषक योगेशजी को वधाई ! इस विषय पर विगत वर्ष मैंने भी “हमारा राष्ट्र-गीत कितना हमारा ” शीर्षक से श्रंखला लिखी थी ! इस गीत की वास्तविकता अधिकांश भारतीय जानते हैं किन्तु तानाशाही लोकतंत्र के आगे विवश ! हाँ आपके लेख की सबसे बड़ी उपयोगिता गांधी जी के विषय में स्पष्टीकरण है ! मैं आंकड़े या सन्दर्भ देने में लाचार भी हूँ और निरुत्साही भी किन्तु यदि गाँधी पर कुछ और हो तो अवश्य प्रस्तुत कीजिएगा !

Hamza के द्वारा
November 15, 2011

अब है तो है….. जलते रहो

Amit के द्वारा
November 15, 2011

रौशनी……१९४७ मे तब नेहरु जी ने अपनी अक्ल का कुछ जादा इस्तेमाल किया था……….. और अब आप गड़े मुर्दे उखड कर जबरदस्ती अपनी सोच दूसरो पर डाल रही है….कृपया करके देश तो तोड़ने वाले लेख न लिखे…….और अपनी समझ को सुधारे……और शिक्षा , हॉस्पिटल और जनसँख्या पर अपने विचार लिखे …यही ३ चीज़े हमारे देश की प्रगति मे बाधक है…….और कुछ नहीं…..

    Hamza के द्वारा
    November 15, 2011

    शाबाश दोस्त…

    बैजनाथ पाण्डेय के द्वारा
    November 22, 2011

    अमित एवं Hamza जी, बाधक तो आप जैसे गुलाम लोग है जो देश का नहीं होकर भी देश की भलाई का ढोंग करते हैं | सतयुग मे ऐसे लोग असुर, त्रेतायुग मे राक्षस, द्वापर मे दैत्य एवं कलयुग मे कांग्रेसी अथवा धर्म-निरपेक्ष कहलाते हैं |हर युग मे आप जैसे लोंगों को अंत मे हारना पड़ता है ……..और हाँ, पाउडर का दूध पीकर औरों को समझ न सिखाइए जनाब ! तहजीब से पेश आइये |

    Arun के द्वारा
    November 23, 2011

    very good dear………we are live in present not past and our thought is future “one day we can change the world” Desh todna to Roshni jaise politician ka kaam hai

    Baijnath Pandey के द्वारा
    November 24, 2011

    Dear Arun ji, Living in present does not imply swallowing insult and compromising national integrity. Like you, I also believe in changing the situations but that will never happen until we are brave enough to accept the truth. For your kind information, some of my best friends are muslims and non of them like Jan Gan Man. I believe they are much loyal to this country than those who call themselves ‘Secular’ and break the society just for the sake of few votes. If you love your country, open up your mind, speak and accept the truth……..and you are WELCOME !!! This country needs everyone equally ……… our goal will remain a distant dream unless everyone stretches his hand out for support. Thankyou.

    khatu के द्वारा
    November 24, 2011

    शाबाश दोस्तों….. जब तक आप जैसे लोग है देश चलता रहेगा…. ये मत सोचिये की कल गीत किसके लिए बना था … बल्कि ये सोचिये की आज वो गीत कितने लोगो के दिल में बस चूका है….क्यों उसी मोड़ पर कलाना कहते हो देश को..हिन्दू मुस्लिम कुछ नहीं होता हम सब इंसान है यार …….

amarshiv के द्वारा
November 14, 2011

Roshni ji, kuch geet aise bhi hote hai kuch log unhe priyatama ke liye gungunate hai to kuch log use khuda ki ibadat samgh uske samne pes karte hai .Udaharan ke liye he Govind yani agrawal ji ke bhajno me to lagbhag gazal hi hoti hai mera matlab aap samagh hi gai hogi. kal kya tha ye na samghaiye aaj use desprem me doobkar sochye dhanyvad

vikram raghuwanshi के द्वारा
November 12, 2011

bahaut bahut dhanuawad sir ji i think Vande matram ko hi hamara rastriya geet hona chaiye tha bat yahi to DESH ka durbhagya hai,

nagi के द्वारा
November 12, 2011

गुलामी का प्रतीक है ये , इन कांग्रेसियों को इसमें कहाँ से स्वाभिमान नज़र आता है ये समझ से परे है. जार्ज पंचम की तारीफों में पढ़ा गया कसीदा है ये , उसकी स्तुति है ये…………नागेश खरे ‘नागी’ , बांदा 9415170115

    nagi के द्वारा
    November 12, 2011

    join me om face book….nagesh khare

munish के द्वारा
November 11, 2011

राष्ट्रगान और एतिहासिक तथ्यों को उजागर करता एक अच्छा लेखा हालांकि मेरी जानकारी के अनुसार घटनाक्रम कुछ इधर उधर है परन्तु सार वही है…… http://munish.jagranjunction.com/2011/11/05/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b8%e0%a5%80/

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    munish ji dhnaywad जैसे के मैंने ऊपर लिखा है की किसी भी प्रकार की जानकारी हो आप यहाँ सांझी कर सकते है … आपका सवगत है अगर आप उपलब्ध जानकारी साँझा करना चाहे तो .. आभार

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 11, 2011

आपका बहुत बहुत शुक्रिया रोशनी जी इस यथार्थवादी लेख को साझा करने के लिए। टैगोर ये जानते हुए भी कि - वे अपने ही पावों पर मारे जाने के लिए कुल्हाड़ी तैयार कर रहे हैं, ने ये गीत उस समय के काले अंग्रेज़ों के दबाव और उनकी चाटुकारिता की अलभ्य इच्छा के चलते लिखा था। इस विषय पर हमारे ब्लॉगर बंधु चर्चित चित्रांश जी भी कई लेख लिख चुके हैं। कुछ सामग्री मेरे पास भी थी जो फ़िलहाल अनुपलब्ध है। ख़ैर आपका यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय एवं प्रेरणादायक है। राष्ट्र गीत के सच्चे हक़दार -वंदे मातरम- के साथ सरासर अन्याय किया गया है वह भी एक सोचीसमझी साज़िश के तहत। इस लेख को साझा करने के पीछे आपकी भावनाओं की कद्र करते हुए आपका आभार व्यक्त करता हूँ।

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    वाहिद जी नमस्कार धन्यवाद तो मुझे सब ब्लॉगर साथियों का करना है जिन्होंने इस सच को पढ़ा और अपना समर्थन दिया … वन्दे मातरम के साथ ये अन्याय क्यों ?? हमारे राजनेता इतने नीच है की एक गीत के साथ ऐसा कर सकते है तो सोचिये आम जनता का क्या हाल होता है … हर बात हर घंटना जो भी देश मे हो रही है सब इन का ही कराधरा है … आज भी देख लीजिये सर्कार किस तरह देश को बेचने मे लगी है .. अच्छा होता अगर आपके पास जो जानकारी है उसे भी आप साँझा कर पाते.. आपके विचारों के लिए आभार धन्यवाद

rudrapunj के द्वारा
November 11, 2011

रौशनी जी सुप्रभातम , सुबह-सुबह जब आपका यह लेख पढ़ा ,कुछ नई और विवादित तथ्यों की जानकारी हुई |सत्यता कितनी है ये तो वास्तव में शोध का विषय है लेकिन आपके इस लेख में महक तो सच्चाई की ही आ रही है |बहुत-बहुत धन्यबाद और बधाई रुद्रनाथ त्रिपाठी वाराणसी

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    रुद्रपुन्ज जी नमस्कार धुआं तबी उठा है जब आग लगी होती है .. इसलिए मेरा मनना है की अगर और शोध किया जाये तो काफी कुछ और मिल सकता है … यु भी न जाने अतीत के गर्भ मे कितने राज होगे … धन्यवाद

vikramjitsingh के द्वारा
November 10, 2011

एक जानकारी वर्धक सुन्दर लेख, धन्यवाद रोशनी जी.

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    विक्रम जी धन्यवाद

Harish Bhatt के द्वारा
November 10, 2011

रोशनी जी नमस्ते, हमारे नेताओं की सच्चाई बयां करते लेख के लिए बहुत बहुत बधाई. यहाँ पर मैं आदरणीय शाही की बात से सहमत हूँ. हम भले ही बाहरी तौर पर आज़ाद ho गए है पर मानसिकता अभी bhi गुलामी वाली ही है और जब तक मानसिक तौर पर आजाद नहीं होगे. तब तक बस यूँ ही…

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    हरीश जी नमस्कार .. अपने सही पहचाना ये लेख किसी गीत पे नहीं बल्कि हमारे नेता लोगों की गलत नियत घटिया राजनितिक चालों और अपने स्वार्थ के लिए गलत को भी सही करके आम जनता को गुमराह करना … धन्यवाद आपके विचारों के लिए आभार

Amita Srivastava के द्वारा
November 10, 2011

रौशनी जी इस विषय पर नवीन जानकारी देने के लिए धन्यवाद | १९११ से २०११ ….१०० साल हो गये | मतलब वही कि राजनीति ने हमेशा ही खेल ……….| लेख पढ़कर कही थोड़ी चोट भी पहुचती है |

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    अमिता जी राजीनीति हमेशा खेल ही खेलती आई है और खेलती रहेगी ..जी सत्य जानकर दर्द तो होता ही है आखिर दिल को लगती है बात …और ये चोट ही देश के लिए एक जज्बा जगा सकती है आभार

Santosh Kumar के द्वारा
November 10, 2011

आदरणीय रोशनी जी ,..बहुत जानकारीपूर्ण तथ्यपरक आलेख के लिए आपको हार्दिक साधुवाद …मैं आदरणीय शाही जी के विचारों से सहमत हूँ ,..सादर आभार

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    संतोष जी .. आपके विचारों और सहमति के लिए आभार

alkargupta1 के द्वारा
November 10, 2011

रोशनी जी, अच्छी जानकारीपूर्ण आलेख की प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई !

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    अलका जी धनयवाद

abodhbaalak के द्वारा
November 10, 2011

रौशनी जी बड़ी रोचक जानकारी देता लेख, पर इसकी सत्यता की जांच करनी पड़ेगी, जो तथ्य आपने दिए हैं उसे किताबो से देखना पड़ेगा, क्योंकि आपने रविन्द्र नाथ टैगोर की जिस रूप में दिख्याया है वो ……… संभवता बाद में मई फिर आपके इस पोस्ट पर आ कर कमेन्ट करूँ पर बिना इसको डीप में जाने, हर तथ्य को, चाहे वो टैगोर जी के बारे में हो या और भी …….., कुछ नहीं कहना चाहूँगा… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    roshni के द्वारा
    November 10, 2011

    अबोध जी जरुर ..जो भी लिखा जाये उसकी जाँच होनी चहिये.. अगर ये सब झूठ है तो हमे इस झूठ को खतम करना होगा ..क्युकी नेट पे इस subject पे काफी कुछ पड़ा .. फिर मुझे ये सब एक मेल से मिला … बाकि अगर ये झूठ होगा तो मै ख़ुशी ख़ुशी इस पोस्ट को delte कर दुगी क्युकी गलती चाहे कैसी भी हो उसे खतम कर देना ही अच्छा होता है …. धन्यवाद आभार

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 10, 2011

रौशनी जी बहुत सुन्दर जानकारी दी आप ने जितना ही शोध किया जाए कुछ न कुछ राज की बातें उजागर होती रहती हैं जो भी हो अब हम आज इस झंडे के नीचे हैं और इस गान को अपना आन बाण शान समझते हैं इसके पीछे मर मिटते हैं शहीद होते हैं तो इसकी मर्यादा को आइये बनाए रखें कुछ विवादित न हो …. कभी कभी किसी अच्छे इंसान की एकाध कमी को जैसे हम नजरअंदाज कर के उसका मान रहने देते हैं वैसे ही आशा है आप मेरी बातों पर गौर करेंगी जिससे कुछ खुरापाती तत्व लाभ न ले …… भ्रमर ५

    bharodiya के द्वारा
    November 10, 2011

    यही तो गुलामी की निशानी है, गलत चीज को अपनी आन बान समज लेना । कोइ गलत को सही करवाना चाहता हो तो वो खुराफाति कैसे हो गया शुकलाभाई ।

    roshni के द्वारा
    November 10, 2011

    शुक्ला जी नमस्कार ये ऐसा विषय है जिसके बारे मे हम लोगों को आज पता चला मगर बहुत सरे लोग इसके बारे मे पहले से जानते है .. और इसका लाभ तो कोई नहीं उठा सकता क्युकी ये पहले से ही चला aa रहा है … यु भी लोग जल्दी भूल जाते है कौन याद रखता है सच .. आजकल तो यु भी अगर किसी को भी राष्ट्र गान पूरा बोलने को कहेगे तो कोई नहीं बोल पता … आपके विचारों का सवागत है … और आपकी प्रतिक्रिया के पीछे छुपी हुई आदर की भावना जो देश के प्रति है आभार

vikasmehta के द्वारा
November 10, 2011

शानदार ……………..

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    शुक्रिया

Amar Singh के द्वारा
November 10, 2011

बहुत ज्ञानवर्धक लेख सादर बधाई http://singh.jagranjunction.com pirate bay, limewire

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    धन्यवाद अमर सिंह जी

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 10, 2011

आदरणीय रोशनी जी सादर प्रणाम,,,,,,,,,,,,,,बेहतरीन विषय पर लिखे लेख को सबके बीच प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार!

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    धर्मेश तिवारी जी धन्यवाद

shashibhushan1959 के द्वारा
November 10, 2011

आदरणीय रौशनी जी, सादर. जख्मो को कुरेदने से दर्द और बेचैनी ही मिलती है. कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनको भूलना ही अच्छा है. हमारे देश के रणबांकुरे इसी तिरंगे और इसी राष्ट्र गान पर अपना जीवन बलिदान करने को तैयार रहते हैं. कितने कर चुके हैं. जो बात होनी थी वह तो हो गई. धन्यवाद्.

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    शशि जी .. दर्द और बेचनी के दर से अगर हम सच से दूर हो गए तो ये ख़तम नहीं होगी … दर्द की दावा करने से ही दर्द दूर होता है .. जो हो गया सो गया की मानसिकता के कारन ही आज कोई भी घटना दुर्घटना , घोटला या फिर कोई अपराध ही क्यों न हो को हम भारिरी बहुत जल्दी भूल जाते है … अगर उस को याद रखा जायेगा तबी तो उसे सुधार जायेगा .. आवाज उठाई जाएगी …… हो होना था वोह तो हो गया और ये भी सब जानते है की बदलने वाला कुछ नहीं मगर बिना किसी कोशिश के शायद हार मान लेना भी उचित नहीं … कुछ और हो न हो कम से कम इस का जवाब तो मिलना ही चलिए हर नागरिक को … आभार

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 12, 2011

    जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में था तभी हमारे हिंदी के शिक्षक जी ने इस सच्चाई को बताया था. यद्यपि की मैंने प्रतिक्रिया तो लिख दी थी, पर बाद में स्वयं इसपर विचार करने लगा तो लगा कि नहीं इसका विरोध तो करना चाहिए. और पुरजोर करना चाहिए. वास्तव में यह भूलने वाली भूल नहीं है, क्योंकि राष्ट्रगान के साथ देश कि अस्मिता जुडी होती है.

आर.एन. शाही के द्वारा
November 10, 2011

चाहे जिसका भी लिखा लेख हो, आपने प्रस्तुत किया है, इसलिये इस बेबाक़ प्रस्तुतिकरण के लिये आपको कोटिश: बधाइयां रोशनी जी । यह विडम्बना ही है कि अंग्रेज़ी हुक़ूमत के झन्डाबरदार ग़द्दार ही इस देश की भोली जनता के शरमाएदार बन गए, जिनकी बदबूदार लाशों को ढोने के लिये ये देश आज भी अभिशप्त बना हुआ है । यह जानते हुए भी कि स्विस बैंकों में ज़मा अधिकांश कालाधन इन ग़द्दारों की ही मिल्कियत है, इस देश की ग़ुलाम मानसिकता आज भी इनकी बेशर्म और ढीठ सत्ता द्वारा ही शासित है । ये मक्कार आज भी अपनी अधिनायकवादी नीतियों के शिगूफ़े नित्यप्रति उछाल रहे हैं, और बिकाऊ मीडिया उन्हें लपक-लपक कर जनता के जले पर नमक की तरह छिड़क रही है । कब तक हम सचमुच के आज़ाद देश में सांस लेने के क़ाबिल बन पाएंगे, कहना मुश्किल है । आभार !

    roshni के द्वारा
    November 10, 2011

    शाही जी नमस्कार ये लेख तो यहाँ बस सबको जानकारी देने के लिए है ..और मै चाहती हूँ की लोग इस गलत न ले … जब आज हम हर बात का इतिहास जानते है तो इसका इतिहस भी सबको मालूम होना जरुरी है … ये सिद्ध करता है की किस तरह सरकारे अपने हित के लिए अपनी जिद के लिए और परस्पर दुश्मनी के आधार पर जनता को सच से दूर रखती है … aap की और से सकरात्मक प्रोत्सहन के लिए आभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 11, 2011

    लेख के तथ्यों में कहीं कोई गफ़लत नहीं है, जैसा कि ऊपर अबोध जी आदि ने शंकाएं प्रकट की हैं । इस विषय में टुकड़ों-टुकड़ों में हम आधी शताब्दी से पढ़ते चले आ रहे हैं । फ़र्क़ ये है कि किसी ने पहली बार दिलेरी और बेबाक़ी से तथ्यों को पूरे विस्तार के साथ रखने की कोशिश की है । हमारी आस्था रही है कि जब किसी मिट्टी की मूरत में भी प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाती है, तो वह स्वत: ही पूजित हो जाता है । ठीक उसी प्रकार चाहे जिस परिस्थिति में भी इन लाइनों को जब राष्ट्रगान के रूप में संवैधानिक रूप से प्रतिष्ठित कर दिया गया है, तो जबतक इसे संवैधानिक रूप से ही बदलकर कोई अन्य विकल्प प्रतिष्ठित नहीं कर दिया जाता, हम इसे सम्मान देने के लिये बाध्य हैं, क्योंकि यह हमारा राष्ट्रीय और नागरिक कर्त्तव्य है । तब तक यही कहा जा सकता है कि, जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ, और जब जाग जाएं, तभी सवेरा होता है । चान्डाल साम्राज्य के पतन के बाद ही इस दिशा में कुछ सम्भव हो सकता है । आज जनता इतनी भोली नहीं रह गई है कि लकीर का फ़क़ीर बनी रहे । इन लाइनों के विश्लेषण के बाद एक बच्चा भी प्रत्येक अभिप्राय को भली भांति समझ सकता है । आभार !

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    शाही जी एक बार फिर से आप का धन्यवाद .. सच जो भी हो बस हम सच सवीकार करना नहीं चाहते .. और जो हो गया सो गया के आधार पर जो चला आ रहा है उसी को चलता रहना चाहते है … फिर से आभार

vinitashukla के द्वारा
November 10, 2011

गुलाम मानसिकता और अवसरवादी राजनीति पर प्रकाश डालती हुई अच्छी पोस्ट. बधाई रौशनी जी.

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    विनीता जी धन्यवाद

krishnashri के द्वारा
November 10, 2011

महोदया, बहुत सुन्दर ,तथ्य परक ,विचारोत्तेजक जानकारी के लिए आपका आभार /देश को कैसे बेवकूफ बनाया गया यह इसी से साबित होता है / पुनः आपका धन्यवाद /

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    क्रिश्नाश्री जी न जाने कौन कौन से ऐसे सच होगे जो हमे मालूम नहीं .. भारत की भोली भली जनता तो हमेशा से इन नेताओं के द्वारा छली जाती रही है… आभार

nishamittal के द्वारा
November 10, 2011

बहुत जी ज्वलंत विषय पर आलेख प्रस्तुत करने के लिए बधाई रौशनी.

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    निशा ji आभार

Ramesh Bajpai के द्वारा
November 10, 2011

रौशनी जी आपकी इस सराहनीय पोस्ट का स्वागत है | बहुत कम लोगो को इस विषय में जानकारी होगी | पूरी बात तो मुझे भी नहीं मालूम थी | {आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर। जय हिंद |} भारत की बेटी के ये अमूल्य भाव अनमोल है आप को हार्दिक बधाई | बंदेमातरम |

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    आदरनिये बाजपाई जी सही कहा अपने बहुत कम लोग इस बारे मे जानते है .. और जिसे जानकारी मिलती है उसे दुःख भी होता है .. आपके विचारों के लिए आभार

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    भरोदिया जी लिंक भेजने के लिए धनयवाद .. .. मैंने इसे पूरा सुना है….. वन्दे मातरम

sumandubey के द्वारा
November 9, 2011

रोशनी जी नमस्कार, बहुत अच्छा आलेख जिसमे एऐसी जान्कारी है जो जन ग़न मन के प्रति जो श्रद्धा थी वह कम हो गयी इतिहास जान कर इसकी रचना की कहानी जाकर मुझे लगता है हर भारतीय को इसके लिये भी नई बहस छेड्नी पड़ेगी।धन्य्वाद देखे मेरा भी ब्लाग्।

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    sumandubey जी निश्चित ही ये एक बहस का विषय है .. ताकि सही जानकारी सबतक जा सके …l आभार

Paarth Dixit के द्वारा
November 9, 2011

आदरणीय रौशनी जी, नमस्कार.. सच में यह तो बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी बाँटी है हम सबके साथ..मुझे तो जन गण मन का असली अर्थ तो आज ही पता चला..आपका और श्रीमान योगेश जी का बहुत-बहुत आभार..मेरी विचारधारा तो गरम दल के ही साथ है मै भी ये जानने के बाद वन्दे मातरम..ही गाना पसंद करूँगा..एक महतवपूर्ण जानकारी प्रदान करता लेख..हार्दिक बधाई.. ..साधुवाद..

    roshni के द्वारा
    November 11, 2011

    पार्थ जी मै भी योगेश जी का और उनका धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने मुझे ये जानकारी पोस्ट करने के लिए भेजी … मैंने तो बस सबके सामने राखी है .. मुझे भी आज ही इसका ये अर्थ पता चला आभार

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 9, 2011

जार्ज पंचम के स्तुति गान को किस अंधेपन तक अपनाया गया है इस पर नज़र डालने के लिए आप इस के लिए बने नियम पर गौर करे तब आपको लगेगा की आज भी हम जार्ज पंचम के सम्मान में खड़े है. और उसको कह रहे है,, की तू भारत का भाग्य विधाता है और तेरी जय हो ………….. . . क्योंकि भारतीय परंपरा में चाहे वो हिन्दुओं में हो चाहे मुस्लिमों में या अन्य किसी भी धर्म में, ऐसे कोई प्रथा नहीं है की जब उनका धर्म श्लोक गाया जाये या कुरआन का पाठ हो तो सब सीधे खड़े हो कर रुक जाये……… पर अगर आप गौर करे तो अंग्रजों में ये परम्परा है की जब राजा या रानी आये तो सब पहले झुक कर अपनी अपनी जगह पर सीधे खड़े हो जाते है……

    roshni के द्वारा
    November 10, 2011

    पियूष जी .. शायद अपने भी इस बारे मई पहले कुछ लिखा था .. मेरे ध्यान मै आपके द्वारा दी गयी जानकारी भी थी इसलिए जब विस्तार से इस बारे मे article मिला तो पोस्ट क्र दिया ताकि सब ब्लॉगर साथी पढ़ सके …आभार

    रवि मिश्र के द्वारा
    November 24, 2011

    बधाई इस विचारोत्तक लेख को मुझ तक पहुँचाने के लिए,अच्छा लगा राख में चिंगारियां बसर कर रही है,इन्हें महफूज रखियेगा क्यों कि एक न एक दिन लोगों का स्वाभिमान जरूर जागेगा और तब वे गुलामी के इन प्रतीक चिन्हों को जला कर राख कर दिया जायेगा.

    PRADEEP के द्वारा
    February 1, 2012

    IT MIGHT HAVE BEEN WRITTEN IN THE PRAISE OF GEORGE V BUT NOW WHAT CAN BE DONE….WHAT THE PEOPLE SUGGEST…..MY SUGGESTION IS THAT LET IT BE LIKE THIS. THE REASON IS WHEN WE SING IT IT IS NOW WITH THE FEELINGS FOR OUR COUNTRY AND NOT THE GEORGE V. SO IT DOESN’T MATTER. SO MANY PEOPLE SACRIFICED THEIR LIVES SINGING THIS. NOW IT IS ALL ABOUT FEELINGS AND NOT THE OLD FACTS. EVEN MOST OF THE PEOPLE ARE NOT AWARE ABOUT THIS. THERE ARE SO MANY THINGS PLACES, BUILDINGS ETC OF BRITISH TIME, THAT DOES NOT MEAN WE DESTROY EVERYTHING. RATHER WE SHOULD HAVE FEELING OF TAKING OVER ALL THESE AND INDIANISE THEM. ELSE, WE WILL HAVE TO DESTROY GATE WAY OF INDIA, AND SO MANY OTHER MONUMENTS WHICH WERE CONSTRUCTED BY BRITISH AND FEW IN WELCOMING KING GEORGE. EVEN PRESIDENT PALACE WAS BUILT BY BRITISH AND VICEROY USED TO LIVE THEIR. THAT DOESN’T MEAN WE DESTROY THAT. RATHER WE SHOULD BE HAPPY THAT INDIA TOOK OVER IT FROM BRITISH AND THREW BRITISH OUT OF IT….JAI HIND


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