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सस्ते जज्बात

Posted On: 18 Oct, 2011 में

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बड़े बड़े इन शहरों में बस पत्थर दिल ही बसते है,
चोट लगे तो दूर खड़े ये जोर जोर से हँसते है…..

    पाला है सापों को मैंने दोस्त दिया है नाम इन्हें,
    प्यार जताने को ये अपना पल पल मुझ को डसते है……

गहने कपडे खाना रहना महंगा है अब सब कुछ ही,
पाक-साफ इस दिल के जज्बात ही बस सस्ते है……

    ढूढता रहता हूँ मै जिसको, उसका पता सब जानते है
    किस रस्ते से जाऊ अब मै उस तक जाते कितने रस्ते है …

उसको शायद मालूम नहीं क्या क्या गुजरती है दिल पे
बातों बातों में जब अपने हमको ताने कसते है …..

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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dinesh aastik के द्वारा
December 6, 2011

दिल की गहराई तक उतरे, यह गजल आप जो लिखते हैं। जिनको पाला था साँप हि थे, पर इन्सानों से दिखते हैं। भावों से है भरी गजल, तारीफ किये बिन रहूँ नहीं।  यह गजल आपकी है लेकिन, पर भाव ”आस्तिक” लगते हैं।

    roshni के द्वारा
    January 3, 2012

    धन्यवाद दिनेश ji

Amita Srivastava के द्वारा
November 2, 2011

रौशनी जी कही डसते ,कही चुभते ,गहरे भाव को समेटे अच्छी गजल …

    roshni के द्वारा
    November 3, 2011

    अमिता जी प्रशंसा के लिए तहे दिल से शुक्रिया आभार

sdvajpayee के द्वारा
November 2, 2011

  अच्‍छी अभिव्‍यक्ति रोशनी जी। लेकिन  किसी ने कहा है-   हां , हम नहीं वफापरस्‍त जाओ बेवफा ही सही   जिसको हो जाने दिल अजीज , मेरी गली में आए क्‍यों।

    roshni के द्वारा
    November 2, 2011

    Respected Sdvajpyee जी नमस्कार धन्यवाद प्रशंसा के लिए आभार सहित

Shrish Bhai Selot के द्वारा
November 2, 2011

रोशनी जी, बहुत अच्छी रचना लिखी है।हमारे इस भौतिक समाज मे रोशनी की एक किरण आप की तरफ से आ रही है। इस तरह अच्छी रचना लिखते रहियेl धन्यवाद

    roshni के द्वारा
    November 2, 2011

    शरिश जी रचना को पसंद करने के लिए और प्रोत्सहन के लिए तहे दिल से धन्यवाद आभार सहित

rajesh के द्वारा
November 1, 2011

Roshni ji Nice poem. Just keep it up……

    roshni के द्वारा
    November 2, 2011

    thank u rajesh ji

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 27, 2011

रोशनी जी, बहुत अच्छी रचना……. आकाश तिवारी

    roshni के द्वारा
    November 1, 2011

    आकाश जी धन्यवाद आप आजकल कुछ लिख नहीं रहे आशा है जल्दी कुछ पोस्ट करेगे आभार

RaJ के द्वारा
October 26, 2011

दीयों का कद घटाने के लिए रातों को बड़ा करना , बड़े शहरों में रहना हो तो बातें बड़ी करना इनको पता ही मुहब्बत के घरों का कच्चापन इन आँखों को बस आता है बरसातें बड़ी करना रौशनी जी बधाई

    roshni के द्वारा
    November 1, 2011

    राज जी धनयवाद बहुत खूब शेर कहा अपने आभार सहित

आर.एन. शाही के द्वारा
October 23, 2011

रौशनी जी, समय-समय पर किश्तों में प्रकट होने वाले आपके जज़्बात के हज़ारों रंगों में से इस रंग ने भी रंग जमा दिया । बधाई !

    roshni के द्वारा
    October 23, 2011

    शाही जी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद आभार सहित

Man ka panchhi के द्वारा
October 20, 2011

रौशनी जी, नमस्कार अच्छा लिखा आपने दोस्ती के बारे मैं …. आपकी रचना पढ़कर मुझे किसी शायर का एक शेर याद आ रहा है जो एक शायर का कहा सुनलें जमाने वाले दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले दूसरी ओर एक विज्ञापन दोस्ती के बारे मैं कुछ यों कहता है … चाय के लिए जैसे टोस्ट होता है वैसे हर एक दोस्त जरुरी होता है खैर दोस्ती के बारे मैं अपने अपने अनुभव और ख़याल हैं लोगों के आपके अच्छे अल्फाज से सजी रचना पर भोत – भोत बधाई..

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    पंछी जी नमस्कार ये दुनिया है यहाँ हर तरह के लोग है … आज हवाओं मे जेहर है मगर साँस लेना फिर भी जरुरी है … हर सिके के दो पहलु होते है ..खेर दुआ है सबको अच्छा ही अनुभव हो रचना पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
October 19, 2011

रोशनी जी ,..सच्ची अभिव्यक्ति ..जज्बातों की ही कद्र नहीं ..बाकी का सबकुछ मिलता है ,..

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    संतोष जी रचना पसंद करने के लिए आभार

sadhana thakur के द्वारा
October 19, 2011

एक अच्छी रचना ,अच्छा प्रयास …..

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    धन्यवाद साधना जी

Alka Gupta के द्वारा
October 19, 2011

रोशनी जी, आज की दुनिया में सच्चे व आदर्श दोस्तों का सर्वथा आभाव सा ही है….. सत्यता का आभास कराती हुई बहुत ही बढ़िया काव्य रचना……

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    अलका जी , सच कहा अपने अच्छे दोस्त अब मुश्किल से मिलते है रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद

meenakshi के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी , वर्तमान में रिश्तों के परिवर्तित स्वरुप को दर्शाती सुन्दर काव्य रचना , बधाई …आपको.. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    meenakshi ji tarif ke liye bahut bahut dhanywad

abodhbaalak के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी आजके समाज के अन्दर फैले हुए रिश्तो के रूप बदल गए हैं. दोस्त अब दोस्त कहा रह गया है, अपने अपने , अब अपने …………… “मई हूँ हैरान के हर सू ये तमाशा क्यों हैं जो थे अपने वही अब दूर खड़े हँसते हैं, आई आवाज़ के हैरान परेशां न हो ये नए दौर का माहौल है जज़्बात यहाँ सस्ते हैं” आशा है की आपकी अगली रचना जल्दी ही ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    अबोध जी आप ने तो बहुत बढ़िया शेर कह दिया अच्छा लगा ऐसे ही अपने विचार देते रहिएगा आभार सहित

Abdul Rashid के द्वारा
October 19, 2011

पाला है सापों को मैंने दोस्त दिया है नाम इन्हें, प्यार जताने को ये अपना पल पल मुझ को डसते है…… बेहतरीन रचना के लिए बधाई

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    रशीद जी हमेशा की तरह तारीफ के लिए तहे दिल से शुक्रिया आभार

vinitashukla के द्वारा
October 19, 2011

दोस्ती के नाम पर दगा करने वालों पर सुन्दर कटाक्ष. बधाई रौशनी जी.

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    विनीति जी प्रशंसा के लिए धन्यवाद

tahir khan के द्वारा
October 19, 2011

शालिनी जी सुन्दर कविता. लेकिन आप शांप को पालेंगी तो सांप तो एक दिन डसेगा ही …..! सुक्रिया कविता लिखने के लिए…

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    ताहिर खान जी कविता को पसंद करने के लिए शुक्रिया … अगर जंतु रूपी साप हो तो कोई न पाले मगर इंसानों के अंदर छुपे इन काले सापों को कैसे कोई जान सकता है .. और मेरा नाम रौशनी है शालिनी नहीं धन्यवाद

vikasmehta के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी नमस्कार हमने भी अपनी जिन्दगी में कई सापों को पाला है ………पाला है सापों को मैंने दोस्त दिया है नाम इन्हें, प्यार जताने को ये अपना पल पल मुझ को डसते है……

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    विकास जी नमस्कार इन साप रूपी दोस्तों से दूर भी नहीं जाया जा सकता क्युकी ये आपको तलाश ही लेते है धन्यवाद रचना पसंद करने के लिए

nishamittal के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी तुमने पुनः अपनी रचनाओं को समय दिया या कहूं कि मंच पर प्रस्तुत किया बहुत सुखद लगा.रचना थोड़े ही में बहुत कुछ कह रही है.बधाई.बधाई अपने साहब को भी दे देना प्रतिभासम्पन्न कवियत्री पत्नी का साथ मिलने की.

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    निशा जी नमस्कार बस आप सब के प्रोत्सहन के फलस्वरूप फिर से रेगुलर होने की कोशिश कर रही हूँ .. और अपने इस शौक को समय दे कर कुछ न कुछ लिखने का प्रयतन करती हूँ .. बाकि आप ने इतनी तारीफ कर दी क्या कहू इतनी तारीफ के अबी काबिल नहीं हूँ .. मगर आप के प्यार के लिए दिल से शुक्रिया ऐसे ही अपना प्रोत्सहन देते रहिएगा धन्यवाद सहित

Lahar के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी सप्रेम नमस्कार | बहुत सुन्दर गजल जिसे पढ़ कर लगा की ये समस्या सिर्फ हमारी ही नहीं है दुनिया में बहुत से लोगों ने सापों को पाल रखा है | वाहिद भाई जी ने सही कहा इसे और विस्तार की जरुरत थी |

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    लहर जी नमस्कार ग़ज़ल पसंद करने के लिए शुक्रिया ..रही विस्तार की बात तो मै इसे आगे नहीं बड़ा पाई क्युकी शब्दों ने यही तक साथ दिया … इसी तरह आपके विचारों से रूबरू करवाते रहिएगा अच्छा लगा धन्यवाद सहित

chaatak के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी, चंद पंक्तियों में ही आपने बहुत कुछ कह दिया| आपके लेखन की यही शैली हमें आपका प्रशंसक बना देता है| मेरा भी यही मानना है कि कम लिखो अच्छा लिखो, कम बोलो अच्छा बोलो.. जो बात ये छोटी सी कविता कह रही है वह शायद १०० पन्नो का लेख नहीं कह सकता| आपके लिए एक बार फिर यही कहूँगा- बहुत खूब! शुभकामनाये एवं बधाईयाँ !

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    चातक जी नमस्कार जी सही कहा अपने कम लिखो मगर अच्छा लिखो .. और कम बोलो अच्छा बोलो .. आप जैसे अनुभवी कवी जब तारीफ करते है तो बहुत अच्छा लगता है .. क्युकी आप खुद भी इस कला के बड़े दिग्ज है तो आपके विचार अनमोल है .. तारीफ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
October 19, 2011

बड़े बड़े इन शहरों में बस पत्थर दिल ही बसते है, चोट लगे तो दूर खड़े ये जोर जोर से हँसते है….. पहली दो पंक्तियाँ ही जिज्ञाषा बढ़ा देती हैं पर तीसरी चौथी पंक्ति तो डसने से डर लगता है! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति-

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    सिंह जी डरे नहीं ये तो एक कवी के विचार है .. बाकि दुनिया मे अच्छे दोस्त भी होते होगे धन्यवाद प्रशंसा के लिए आभार

Syeds के द्वारा
October 19, 2011

रौशनी जी, आज के हालात की सच्चाई को दर्शाती सुन्दर कविता…वास्तव में आज के ज़माने में अक्सर लोग पट थर दिल ही होते हैं..बेहतरीन रचना के लिए बधाई की पात्रा हैं… http://syeds.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    syeds जी कविता के मर्म को समझा और अपने विचार दिए धन्यवाद आभार सहित

राही अंजान के द्वारा
October 18, 2011

सुंदर पंक्तियाँ रोशनी जी…हमेशा की तरह ! पाला है सापों को मैंने दोस्त दिया है नाम इन्हें, प्यार जताने को ये अपना पल पल मुझ को डसते है……!! बहुत बहुत आभार…. :)

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    राही जी रचना को पसंद करने के लिए धन्यवाद आभार

akraktale के द्वारा
October 18, 2011

रोशनी जी नमस्कार, बड़े बड़े इन शहरों में बस पत्थर दिल ही बसते है, चोट लगे तो दूर खड़े ये जोर जोर से हँसते है….. बहुत ही अच्छा लिखा है यही है आजकल की दुनिया और दुनियावाले.

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    अशोक जी नमस्कार रचना को पसंद करने के लिए धन्यवाद आभार सहित

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 18, 2011

रौशनी जी अभिवादन ..सुन्दर जैसे गूंगे को गुड का आनंद ..आज हमने चाह आप ने लिख डाला ..लेकिन हम पत्थर दिल नहीं हम भी कभी कभी शहरों में बसते हैं …..निम्न पंक्तियाँ बहुत ही सटीक और यथार्थ से भरी … गहने कपडे खाना रहना महंगा है अब सब कुछ ही, पाक-साफ इस दिल के जज्बात ही बस सस्ते है… धन्यवाद और बधाई .. शुक्ल भ्रमर ५

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    शुक्ला जी नमस्कार अपने विचारों को शब्द देने की कोशिश करती हूँ जो देखती हूँ आसपास महसूस करती हूँ उसे ही कागज़ पे उतर देती हूँ … आपको रचना अच्छी लगी जान कर खुसी हुई इसी तरह प्रोत्सहन देते रहिएगा धन्यवाद सहित

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 18, 2011

आदरणीया रोशनी जी , सादर अभिवादन ! यथार्थ को दर्शाती सुन्दर अभिव्यक्ति……………..बधाई !

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    डॉ कैलाश जी रचना की सरहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आभार

pramod chaubey के द्वारा
October 18, 2011

पाला है सापों को मैंने दोस्त दिया है नाम इन्हें, प्यार जताने को ये अपना पल पल मुझ को डसते है…… आदऱणीया रोशनी जी सांप पालियेगा तो डसेंगे ही न….

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    प्रमोद जी धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 18, 2011

रोशनी जी, एक बार पुनः सुन्दर रचना के साथ आप उपस्थित हुई हैं। हक़ीक़त से रूबरू कराती ये पंक्तियाँ निश्चित ही सराहनीय हैं फिर भी मुझे लगता है कि आप इस कृति को थोड़ा और विस्तार दे सकती थीं और तब बात ही कुछ और होती। आभार आपका,

    roshni के द्वारा
    October 20, 2011

    वाहिद जी कृति को विस्तार तो देना चाह मगर आगे शब्द नहीं मिले या यु कहे यही तक कलम साथ दे सकी .. मगर आप से गुजारिश है अगर आप आगे इसे कुछ लिख सकते है तो जरुर लिखे रचना पूरी हो जाएगी … आभार सहित


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