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तलाश

Posted On: 18 Dec, 2010 में

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जाने कब से खुद की तलाश है,
कही खो गया है मेरा पता
ऐसा उलझा हूँ जिंदगी के शोर मे,
नहीं सुनाई देती अपनी सदा…….
कई सवाल फन उठाए खड़े,
पूछते है किस बात का है गिला
कई दिलों से खेल के तोड़ के अब ढूंढता फिरता है वफ़ा…….
इक खुशी की तलाश में दर बदर,
भटकता है दीवानों की तरह
जरा मिल मुझसे आ के तू, तुझे सिखा दू गम में हँसने की अदा…….
लहरों में डूबते उबरते हुए,
मिलते है मंजिल के निशा
साहिल पे बैठ के करता है नादाँ पार उतरने की दुआ……..
जलता है जब खुद दीया,
मिलती है तब कही रौशनी
जो उजालों से मिलने की चाह है
तो दिल में पहले इक आग जला……….

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531 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chadndra kailash के द्वारा
May 25, 2011

प्यार की आज की परिभाषा और उस पर भी साथ देने का विदा हया बेचने को , खुला पण नाम देते हैं जो भटके राहों से उन्हें उनसे मिलाना हैं चमक चांदी की आँखों पर कई परदे चदती है चोंध मैं खोने वालों को वहीँ पर वापस लाना हैं जो चलना चाहते हैं साथ लेकिन चल नैन पाते, सहारा देकर उन्हें चलना सिखाना हैं मोहब्बत, चमन की रात रानी हैं चमेली हैं हबस के naagon से bagbain gul को बचाना हैं

    Allayna के द्वारा
    July 12, 2016

    If you wrote an article about life we’d all reach enleihtgnment.

Shailendra के द्वारा
January 19, 2011

roshni ji namaskar ye isq ka hi takaja hai. jisne hame kaha kaha tak gumaya hai. khud ko bhi jala dala magar kha ujala paya hai. nice composed. thanks

syeds के द्वारा
December 25, 2010

रोशिनी जी, सब से पहले क्षमा चाहूँगा, आपकी यह पोस्ट हमने मसरूफियत कि वजह से मिस कर दी थी, एक बार फिर आपकी रचना सांस रोके पढ़ता गया… बेहद सुन्दर कविता…ढेर सारी बधाइयां… http://syeds.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    December 25, 2010

    Syeds जी , आपके हर शब्द और कमेन्ट के लिए तहे दिल से धन्यवाद

    Lakesha के द्वारा
    July 12, 2016

    Not bad at all fellas and gaslal. Thanks.

deepakkumarsahu के द्वारा
December 25, 2010

रौशनी जी बहुत सुन्दर कविता!धन्यवाद मैंने अपनी पहली कविता ” मेरे प्यारे हिन्दोस्तान ये आज क्या हो रहा है” पोस्ट की है, आपकी बहुमूल्य राय के लिए आपका स्वागत है! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com दीपक

    roshni के द्वारा
    December 25, 2010

    दीपक जी धन्यवाद .. आपकी पहली कविता हम जरुर पड़ेगे और राय भी देगे …….

Amit Dehati के द्वारा
December 24, 2010

रौशनी जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .. हार्दिक बधाई !!!!!!!!!!!!!!!!! http://amitdehati.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    December 25, 2010

    अमित जी धन्यवाद आगे भी आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा ….

NIKHIL PANDEY के द्वारा
December 20, 2010

रौशनी जी क्या बात है बहुत सुन्दर गजल है जलता है जब खुद दीया, मिलती है तब कही रौशनी जो उजालों से मिलने की चाह है तो दिल में पहले इक आग जला…

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    निखिल पाण्डेय जी आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

    Melia के द्वारा
    July 12, 2016

    good times ahead Looking for someone to go and have fun with enjoy weekend get hold of aways horny bbw East Boston Eagle Lake Iliolins IL beachs boating toes while in the sand. online dating for free

allrounder के द्वारा
December 20, 2010

रोशनी जी, मन के उत्तम उदगारों की अभिव्यक्ति के लिए बधाई !

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    सचिन जी धन्यवाद ,,,,,

December 19, 2010

roshni ji, as usual, you are brilliant. pl. keep it up.

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    Rajender ji , thanks a lot for ur precious comment………

rita singh 'sarjana' के द्वारा
December 19, 2010

रौशनी जी , ” जलता है जब खुद दीया, मिलती है तब कही रौशनी जो उजालों से मिलने की चाह है तो दिल में पहले इक आग जला……….” अच्छी पंक्तिया …………………बधाई स्वीकारे l

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    रीता जी, आपके प्रोत्सहन और प्रतिक्रिया के लिए दिल से शुक्रिया

Harish Bhatt के द्वारा
December 19, 2010

रोशनी जी नमस्ते, जलता है जब खुद दीया, मिलती है तब कही रौशनी जो उजालों से मिलने की चाह है, तो दिल में पहले इक आग जला…… दिल को छू जाने वाली कविता के लिए हार्दिक बधाई.

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    हरीश जी नमस्ते आपको मेरी रचना अच्छी लगी ये जानकर बहुत खुसी हुई …….. इसी तरह आप प्रोत्सहित करते रहिएगा आभार सहित

December 19, 2010

रोशनी जी, हम सभी अपनी-अपनी मंजिल की तलाश में भटक रहे हॆं,लेकिन मंजिल कहां हॆ,शायद हम खुद नहीं जानते-यही तो जीवन हॆ.किसी शायर की कुछ पंक्तियां याद आ रही हॆ:- “दुनिया की सिर्फ मंजिल पर नजर हॆ लेकिन कहां हॆ मंजिल यह किसको खबर हॆ” सुंदर रचना के लिए-साधुवाद!

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    विनोद जी नमस्कार , मंजिल हाँ बस मंजिल ही तो नहीं मिलती रही सफ़र करते करते ख़तम हो जाता है या फिर मंजिल पास होती है हम उसे युही इधर उधर तलाश करते है कस्तूरी की खुशबू की तरह …… आपकी ये पंक्तियाँ बहुत सुन्दर है धन्यवाद

deepakkumarsahu के द्वारा
December 19, 2010

रोशनी जी क्या कविता है आपकी, दिल को छू गयी धन्यवाद deepak http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    दीपक जी धन्यवाद कविता को पसंद करने और प्रतिक्रिया केलिए

abodhbaalak के द्वारा
December 19, 2010

रौशनी जी आपकी कविता/ग़ज़ल की एक अपनी अलग ही छाप होती है, बहुत खूबसूरत के साथ आप इन्हें लिखती हैं, इस बार भी कुछ ऐसा ही है. सुन्दर रचना सदा की भांति http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    अबोध जी हमेशा की ही तरह फिर से तारीफ और प्रतोसाहित करने के लिए धन्यवाद ………… आपकी सुंदर सी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 19, 2010

लहरों में डूबते उबरते हुए, मिलते है मंजिल के निशा साहिल पे बैठ के करता है नादाँ पार उतरने की दुआ……. खूबसूरत पंक्तियों से सजी इस प्रस्तुति के लिए बधाई…..

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    पियूष जी , प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ……. पर आजकल आपकी कोई कहानी ये लेख पढने को नहीं मिल रहा …….आशा है की उत्तराखंड की कोई और अच्छी से कहानी लेकर जल्द आयेगे धन्यवाद सहित

Ramesh bajpai के द्वारा
December 19, 2010

जलता है जब खुद दीया, मिलती है तब कही रौशनी रौशनी जी बहुत ही खूब सुरती से आपने अपनी बात कही है ख़ुशी की तलाश में …… बस यही तो जीवन का क्रम है | मीरा पर रचना बहुत जल्दी पोस्ट कर रहा हु

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    आदरनिये रमेश बाजपाई जी नमस्कार , जीवन का करम युही चलता रहता है बीएस जरूरत है खुद को तलाश करने की खुद में अच्छी तलाश करने की …….. और आपकी पोस्ट के लिए धन्यवाद

mansi के द्वारा
December 19, 2010

Roshni another lovely and touchy poem……… great

    roshni के द्वारा
    December 20, 2010

    mansi ji , आपकी प्रतिक्रिया के लिए दिल से शुक्रिया

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 19, 2010

रोशनी जी, बहुत ही खूबसूरत गजल…. दो शब्द मेरी ओर से…. “ढूढ़ा तुझे गली-गली हर शहर, मिला नहीं तू कही मगर. क्यों बनाया मुझे बदकिस्मत, है खुदा से बस यही गिला….. मैंने बुर्के पर एक पोस्ट डाला है..आपकी नजर उसपर पड़े यही चाहता हूँ… http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    roshni के द्वारा
    December 19, 2010

    आकाश जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद …… मैंने बुर्के पे आपकी पोस्ट पढ़ी थी और कमेन्ट भी दिया था …. मुझे आपकी ये पोस्ट बहुत ही पसंद आई ………मगर मेरे पास ऐसा कोई उदहारण नहीं था तो इसलिए वहां पर दे न सकी ….. आपके दो शब्दों के लिए धन्यवाद ….

nishamittal के द्वारा
December 19, 2010

रौशनी जी,आपकी रचना सदेव की भांति बहुत सुन्दर रचना है “जो उजालों से मिलने की चाह है तो दिल में पहले एक आग जला.” बहुत सुंदर

    roshni के द्वारा
    December 19, 2010

    निशा जी नमस्कार , सदेव की भांति आपका स्नेह पाकर मन को अच्छा लगा ..युही अपना स्नेह देते रहिएगा ………. धन्यवाद सहित

    Steffi के द्वारा
    July 12, 2016

    The pie does look really great, especially with the ice cream. Totally classic.Also, I have never made a chili that actually tasted very good. There have been passable ones but eh. maybe I should try the mussroomh.Very pretty orange kabocha. What an autumnal post.

आर.एन. शाही के द्वारा
December 19, 2010

रोशनी जी, आपकी कविताएं तो बस ऐसी ही होती हैं, जिसपर कमेंट लिखकर कभी भी पूरी संतुष्टि नहीं मिल पाती । क्योंकि किसी शब्द में वो ताक़त हो ही नहीं सकती, जो भावनाओं का मूल्यांकन कर सके । मैं तो बस गानों की लाइनें ही लिख पाता हूं, वही अर्ज़ हैं — औरों को पिलाते रहते हैं, और खुद प्यासे रह जाते हैं, ये पीने वाले क्या जानें, पैमानों पे क्या ग़ुज़री है, ग़ुज़री है- दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या ग़ुज़री है ॥ … बधाई ।

    roshni के द्वारा
    December 19, 2010

    शाही जी नमस्कार आप तो हमेशा ही अच्छे अच्छे कमेन्ट करते है और तिस पर आपके गाने और भी अच्छे ………. शेर हो या गीत की पंक्तियाँ स्नेह और आशीर्वाद के रूप में यही बहुमूल्य है …………. धन्यवाद सहित

    Candid के द्वारा
    July 12, 2016

    That’s not just logic. That’s really sesinble.

Deep के द्वारा
December 18, 2010

वाह रौशनी जी , आपने क्या खूब लिखा है .. आज के दौर में इन्सान अपने आप से बी दूर होता जा रहा है.. कई सवाल फन उठाए खड़े, पूछते है किस बात का है गिला कई दिलों से खेल के तोड़ के अब ढूंढता फिरता है वफ़ा…….

    roshni के द्वारा
    December 19, 2010

    दीप जी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद


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