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मै उड़ना चाहती हूँ

Posted On: 22 Oct, 2010 Others में

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udanमै उड़ना चाहती हूँ सच में हमेशा मेरा मन करता है की उड़ कर कही दूर निकल जाऊ, आकाश की ऊँचाइयों को छु लू , बादलों के बीच जाकर देखू क्या है इनमे जो ये उड़ते फिरते है.. देखू तो सही ये हवा आती कहा से है, और जिस भगवन के लिए हम लड़ते है उसका घर भी तो कहते है न ऊपर ही कही है उसको भगवन को भी मिलकर आती … हाँ हाँ जानती हूँ की इस बारे में साइंस अपने सिद्वांत दे देगी मगर मुझे सिद्वांत नहीं चहिये… मुझे तो खुद इन्हें महसूस करना है … उड़ना है बहतु दूर तक….. आप मेरी इस उडान को अब नारी की तरक्की से मत जोडियेगा … कोई कितनी भी तरक्की कर ले रहेगा तो जमीन पर ही न …… असमान तो छु न पायेगा .. तारों के बीच जाकर टिमटिमा तो न पायेगा ……. काश कोई मुझे अपने पंख दे दे ताकि मै इन सब अहसासों को महसूस कर सकू .. जी सकू जिन्दगी का सबसे खुबसूरत पल… मुझे लगता है की हर नारी जीवन में एक बार जरुर उड़ना चाहती है … आखिर चिड़ियाँ और गुड़ियाँ एक जैसी तो होती है … मामी यु भी तो कहती है की तुम मेरी चिड़िया… मगर काश की इस चिड़िया के भी पंख होते ……..जब मेरा दिल करता मै फुर फुर उड़ कर कभी एक पेड़ की डाली पर बैठती और कभी दूसरी पर … जब मन उदास होता तो एक लम्बी उडान पर निकल जाती…हवा के साथ साथ बहती और रात को चाँद जिसे में रोज़ धरती से देखती हूँ उसके पास जाती और पूछती क्यों चाँद इतना सुन्दर होते हुए भी तू अकेला सा क्यों दीखता है ? क्या तेरा दिल नहीं करता धरती पे आने का ?मगर में जानती हूँ वह कहेगा नहीं धरती पे आने से अच्छा में गायब ही हो जाऊ .. अगर मै उड़ पाती तो मामी को भी चिंता न होती की मेरी बेटी कहाँ गयी कब आयेगी .. मेरे जीवन में मेरे सबसे अच्छे दोस्त होते ये पंछी जिनके साथ दिन भर रहती अपने सुख-दुःख कहती और उनके सुनती… काश की मै उड़ सकती … मेरा मन उड़ना चाहता है .. मगर जानती हूँ कोई मुझे पंख न देगा, कोई उड़ने भी न देगा… शायद जीवन में आकर एक बार ही उड़ना संभव होता है इस जिस्म को छोड़कर.. जब रूह दूर तक उड़ जाती है हर असमान को पार करती हुई…… इंसान होना भी कितनी बड़ी मज़बूरी है…… चलिए कभी तो ये सपना पूरा होगा की इंसान होते हुए भी उड़ सकू .. कहते है न की उम्मीद पे दुनिया कायम है ……….. मगर अगर आप का भी उड़ने का मन करते है या आपको पता है की कैसे उड़ा जाता है जरुर बताइयेगा ……

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731 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akanksha के द्वारा
December 18, 2014

it is very gud and fuck

danishmasood के द्वारा
December 25, 2010

insan hokar udne ki kala men to aap parangat hai arthat kalpana ki udan. is yoni men to itna hi sambhav hai. khush rahen.

atharvavedamanoj के द्वारा
November 4, 2010

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||…………………………….मनोज कुमार सिंह ”मयंक” आदरणीय रौशनी जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

    roshni के द्वारा
    November 12, 2010

    मनोज जी धन्यवाद …. देरी से उत्तर के लिए क्षमा चाहती हूँ आभार सहित

madhvi srivastava के द्वारा
November 1, 2010

nice article………..!!!!!

    roshni के द्वारा
    November 1, 2010

    madhvi ji, thanks a lot

Arvind Pareek के द्वारा
November 1, 2010

सुश्री रोशनी जी, उड़ना यह शब्‍द ही ऐसा है जिसे सुनकर मन कल्‍पना की उड़ान भरनें लगता है । आपनें उस उड़ान को अभिव्‍यक्ति के पंख पहना कर कुछ अधिक ऊँचाई तक पहुँचा दिया है । बस धरती पर रहकर इसी तरह उड़ती रहिए और अपनें मन के पंछियों की उडान को अभिव्‍यक्‍त करती रहिए । अरविन्‍द पारीक (भाईजीकहिन)

    roshni के द्वारा
    November 1, 2010

    अरविन्द पारीक जी , आपकी इतनी सारी शुभ कामनाओ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ….. बस दुआ है की ये सोच के परिंदे इसी तरह उड़ाते रहे . धन्यवाद सहित

Alka Gupta के द्वारा
November 1, 2010

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है। 

    roshni के द्वारा
    November 1, 2010

    अलका जी धन्यवाद …

    roshni के द्वारा
    October 30, 2010

    मनीष जी धन्यवाद …..

    Lidia के द्वारा
    July 12, 2016

    Todcuhown! That’s a really cool way of putting it!

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 28, 2010

रोशनी जी, नमस्‍कार, भई हम तो यही चाहेंगे कि आप मात्र कल्‍पना के ही पंख लगा कर उड़े और जो अनुभुतियां या खवाब है उन्‍हें इसी शरीर में ही महसूस करें क्‍योंकि यह सब चाहते और इच्‍छाएं केवल इस मानव रूपी शरीर को ही प्राप्‍त है इस के बाद का अहसास किसी को भी नसीब नहीं होता। बहुत ही अच्‍छी परीकल्‍पना एवं सोच है। और हम सभी ब्‍लागरस की भी यही चाहत होगी की आप के नए से नए पोस्‍ट हमें पढ़ने को मिल। the style of your writing is unique one, and it always matches with the title of your posts. carry on & good wishes to you. -deepakjoshi63

    roshni के द्वारा
    October 28, 2010

    दीपक जी बहुत बहुत धन्यवाद ………. बस इसी तरह प्रोत्सहित करते रहिये … अच्छा लगता है और लगता है की हम सही दिशा में है ….. और आप सब से बहुत कुछ सीख सकते है …. एक बार फिर से धन्यवाद

sunilsingh के द्वारा
October 26, 2010

vicharon ke pankh laga udana shikh liya aur kahate hain udana nahi aata. khushi milati hai jab bhi kuchh yesa padane ko milta hai. aap aur udo us unchaee ko chhu sako jisko ab tak koee na paya ho magar smhal kar.

    roshni के द्वारा
    October 26, 2010

    सुनील जी, आपको ये कल्पना अच्छी लगे धन्यवाद और आपकी शुभ कामना के लिए भी और हाँ अप्पकी बात याद रखुगी संभल कर ही उडूगी. धन्यवाद सहित

    Jacie के द्वारा
    July 12, 2016

    Johhcnardpla,e, when there is profit sharing you are an owner, if cutting back that 3% makes the company stronger it is good for everyone!!Is it me? Is a conservative estimate of $1 million revenue per employee with a 25% gross margins make the owners starve? These guys are making a lot of money in this environment. Not many businesses have this level of revs/employee. This is only using a conservative estimate of 0.50% management fee of assets under management. I haven’t asked my wife how some of the employees feel or if my estimates are accurate, but I’m certain I’m not far off.

October 25, 2010

बहुत बढ़िया लिखा है आपने……. यूँ ही लिखती रहें …………. एक अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई…….

    roshni के द्वारा
    October 26, 2010

    पन्त जी बहुत बहुत शुक्रिया आपके प्रोत्सहन के लिए…… धन्यवाद सहित

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 25, 2010

रोशनी जी, मैंने आपकी इस पोस्ट पर एक बार पहले भी कमेन्ट दिया था लेकिन मुझे वो कमेन्ट कुछ सही नहीं लगा….उस कमेन्ट के अर्थ का निरर्थ भी हो सकता है..क्षमा करे….बहुत ही अच्छा और नए तरीके से लिखा है आपने.. और आपकी इसी रचना के लिए मेरी तरफ से दो शब्द.. “दूर गगन में मै उड़ना चाहती हूँ,सितारों को छु लेना चाहती हूँ. जमाने का बंधन तोड़कर,हवाओं के साथ मै उड़ना चाहती हूँ… क्या मेरे सपनों को कोई पंख देगा, क्या मेरे अरमानो को कोई रंग देगा… मै अपनों से आज ये पूछना चाहती हूँ, दूर गगन में मै उड़ना चाहती हूँ,सितारों को छु लेना चाहती हूँ..” आकाश तिवारी

    roshni के द्वारा
    October 26, 2010

    आकाश जी, दिल से कहे गए दो शब्द ही काफी है होते है … और आप पुरे मन से प्रतिक्रिया करते है ……… बहुत खूबसूरती से अपने अपने दो शब्दों में सरे अर्थ को समेट लिया …….. इतनी काव्यात्मक टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आभार सहित

rita singh 'sarjana' के द्वारा
October 24, 2010

रौशनी जी, नमस्कार l आपकी रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा l आपकी लिखने की शैली बहुत अच्छी है l बधाई l

    roshni के द्वारा
    October 24, 2010

    प्रिय रीता जी नमस्कार, तारीफ के लिए शुक्रिया बस कल्पना को उडान देने की कोशिश की… आपको मेरा लिखा पसंद आया जानकर सच में बहुत अच्छा लगा.. अप्पकी कहानियां को तो मै खुद ही प्रशंसक हूँ… और अक्सर सोचती हु की किस तरह आप इतनी खूबसूरती से ये सब लिखती होगी .. आपकी प्रतिर्किया के लिए बहुत बहुत आभार धन्यवाद सहित

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 24, 2010

नमस्कार रौशनी जी,बहुत सुन्दर कल्पना को दर्शाता ये लेख काफी सुन्दर है,धन्यवाद!

    roshni के द्वारा
    October 24, 2010

    तिवारी जी नमस्कार, बस हकीकत की दुनिया से निकल कर सोचा थोडा खवाबों के साथ जिया जाये … और मन को शांति और ख़ुशी दी जाये …… धन्यवाद सहित

आर.एन. शाही के द्वारा
October 24, 2010

रोशनी जी समझ नहीं पा रहा कि आपकी उस कल्पना की तारीफ़ करूं, जो साबित कर रही है कि यदि कल्पना में दम हो तो किसी गद्यात्मक रचना में भी कविता से अधिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है । या आपकी अभिव्यक्ति-कला की तारीफ़ करनी चाहिये, जिसने कल्पना को भी जीवन से लबरेज़ कर दिया है । अज़ीब सा खिंचाव महसूस हो रहा है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । कम्प्यूटर से कुछ दिन दूर ही रहने की सलाह के बावज़ूद आपकी इस रचना पर टिप्पणी लिखने से खुद को रोक नहीं पाया । आपकी सीधी सादी दिखने वाली रचनाओं की कल्पना परछाइयों से प्यार भी करती है, और दूसरों के हृदय में उसका एहसास जगाने के लिये मजबूर भी कर देती है । बहुत-बहुत बधाई ।

    roshni के द्वारा
    October 24, 2010

    शाही जी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए … बस युही बैठे बैठे मन में आये विचारो को शब्द दे दिए.. बस छोटी सी कोशिश की है अपने खवाब को कागज पर उतारने की .. पर जब आप जैसे अनुभवी लेखक इतने दिल से पढकर अपनी प्रतिक्रिया करते है तो बहुत प्रोत्सहन मिलता है .. बस सिखने की कोशिश जारी है, और उड़ना भी सीखते सीखते एक दिन आ जायेगा………. आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद इसी तरह अपने शब्दों से प्रतिक्रिया से राह दिखाते रहिएगा… क्युकी अभी तो हमे आप से बहुत कुछ सीखना है…. आभार सहित

abodhbaalak के द्वारा
October 23, 2010

रौशनी जी बड़ी सरल और सहज भाषा का प्रयोग करके आपने बहुत ही सुन्दरता के साथ इस लेख को लिखा है, बस उड़ने के लिए अपने मन को खुला छोड़ देन, और आप कही से कही होंगी, अच्छा लगता है जब की इस तरह की सरह भाषा का प्रयोग में अपने लेख में कर के दिल को छू लेता है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    अबोध जी धन्यवाद प्रोत्सहन के लिए.. बस मैंने भी इसी तरह मन को खुला छोड़ कर ही ये विचार दिए है और धन्यवाद की आपको अच्छे लगे इसी तरह प्रोत्सहन करते रहिएगा आभार सहित

syeds के द्वारा
October 23, 2010

रौशनी जी बेहद खूबसूरत ख्याल,काश ऐसा हो सकता

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    Syeds जी क्या पता किसी दिन ख्याल हकीकत बन जाये चाहे हम सब के बाद ही सही…. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

jalal के द्वारा
October 23, 2010

रौशनी जी उड़ने की बात लगभग हर कोई सोचता है. बचपन में मैं भी उड़ने की कोशिश में दौड़ कर पुल से कितनी बार कुदा पानी में. लेकिन इतनी बार इतनी चोट खाया की समझ में आ गया की शायद ऐसा हो नहीं सकता. लेकिन कहीं न कहीं मुझे ऐसा लगता था की पुरे विश्वाश के साथ अगर छलांग लगाऊंगा तो ज़रूर उडूँगा. फिर क्या एक दिन भरपूर विश्वाश के साथ दौड़ कर उंचाई से लगादी छलांग मैंने (शक्तिमान की तरह). और उड़ने लगा. वोह मज़ा आया के बता नहीं सकता. आखिरकार उसी नदी को उड़कर पार किया. बात सिर्फ इतनी है की सपने में. अच्छा याद दिलाया आपने मेरा बचपन. आभारी हूँ.

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    जलाल जी आपको अपना बचपन याद आ गया इसे अच्छा और क्या हो सकता है .. बचपन जब याद अत है तो इंसान अपने आप ही एक खुसी भरे वातावरण में पहुँच जाता है……… और आपकी पुल से छलांग लगाने वाली बात बड़ी अच्छी लगी बालपन भी न जाने क्या क्या करता है ….. और शक्तिमान की तरह तो हमने भी कई बार कोशिश की है .. आपके विचारों के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

    Derex के द्वारा
    July 12, 2016

    Men soicllstyreasen har väl inte villkorat sitt ja med att du inte får bli sjuk under tiden? Det vore underligt och orättvist i så fall tycker jag.

sagar singh के द्वारा
October 23, 2010

Dear flyining is a good habit , u contunue try to fly , definetly u can go in sky with a free mind, but not with mind, enargy n technology only with dil………..

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    सागर जी आपके विचारों के लिए शुक्रिया.. धन्यवाद

aftabazmat के द्वारा
October 23, 2010

रौशनी जी मैं आपकी इस उड़ान का सम्मान करते हुए आपको बधाई देता हू.

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    आफताब जी , आपके द्वारा दिए गए सम्मान और बधाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद आभार सहित

Nikhil के द्वारा
October 23, 2010

आपकी उडान में हर युवा की उड़ान है. अच्छा लेख, बधाई.

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    निखिल जी, धन्यवाद बहुत खूब कहा आपने .. हर युवा की उडान…. धन्यवाद सहित

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 23, 2010

रोशिनी जी,, बहुत खूबसूरत कल्पना…शायद आपकी कल्पना का जवाब मेरी नयी रचना में तो नहीं छुपा….अगर हो सके तो जरूर पढ़ें… आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    आकाश जी धन्यवाद और आपकी सब रचनाये मै हमेशा पढती हूँ और इसे भी जरुर पढना चाहुगी.. धन्यवाद सहित

nishamittal के द्वारा
October 23, 2010

आपकी कल्पना देख कर मुझको कुछ पंक्तियाँ याद आयीं “पंछी बनूँ उड़ के चलूँ मस्त पवन में आज में आज़ाद हूँ दुनिया के चमन में. ईश्वर करे आपकी उड़न रूपी कल्पना को ईश्वर स्वयं पूर्ण करें आपको सारे प्रश्नों के उत्तर स्वयमेव मिल जाएँ.

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    निशा जी आपकी गीत के रूप में प्रतिक्रिया पाकर खुशी हुई….. आपकी इतनी सारी शुभ कामनाओ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद …. आभार सहित

atharvavedamanoj के द्वारा
October 23, 2010

दिल है छोटा सा…छोटी सी आशा…मस्ती भरे मन की भोली सी आशा ….आसमानों को छूने की आशा ….बहुत ही अच्छा लेख…वन्देमातरम

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    मनोज जी बहुत बहुत धन्यवाद…….. छोटे से मन की छोटी से आशा… गीत की याद दिला दी ……. आपके विचारों के लिए आभार वन्देमातरम

K M MIshra के द्वारा
October 23, 2010

रोशनी बहन नमस्कार । आपके प्रोफाईल में लगी परिंदों की फोटो देख कर ही लगता है कि आप पंछियों की तरह उड़ना चाहती हैं । शायद सपनों में भी आप खूब उड़ान भरती होंगी । उड़ने की अपकी हसरत भगवान किसी न किसी रूप में जरूर पूरी करे । आभार

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    मिश्रा जी नमस्कार, अपने सही पहचाना मै सपनों भी उडती हूँ … और मेरा प्रोफाइल भी इसी बात की और इशारा करता है…. मुझे उड़ते परिंदे बहुत अच्छे लगते है .. धन्यवाद सहित

R K KHURANA के द्वारा
October 23, 2010

प्रिय रौशनी जी, आपकी महत्वाकांक्षा बहुत सुंदर है ! उड़ने की तमन्ना ! आपने तो अपने ब्लॉग में जो चित्र लगाया है वो भी उड़ते हुए पक्षियों का ही है ! शायद यह उड़ने की चाह को ही दर्शाता है ! सुंदर विचार है ! काश आपको पंख मिल सकते और आप उड़ पातीं ! वैसे आप हवाई जहाज की सैर कर लीजिये ! थोड़ी सी तसल्ली तो हो जायगी ! धरती से कुछ ऊपर तो आप उड़ ही सकेंगी ! अच्छा लेख राम कृष्ण खुराना

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    आदर निये खुराना जी नमस्कार काश की सच में पंख मिल जाते….. मगर भगवन जानते है की अगर इंसान को पंख भी दे दिए तो ये बेचारे परिंदों का घरोंदा भी छीन लेगे … मगर फिर भी हसरत होती है उनके जैसे उन्दाना भरने की ……हवाई जहाज पर तो खेर सेर हो जी जाएगी .. मगर फिर भी तसली न होगी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    Veruca के द्वारा
    July 12, 2016

    I have been so beierdwled in the past but now it all makes sense!

Coolbaby के द्वारा
October 23, 2010

Ha Ha Ha Good But I don’t wanna fly, Yes I dream but , Every dreams not been came true, Dreams are to relax not much.

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    Coolbaby ji some words , ” Keep your heart open to dreams. For as long as there’s a dream, there is hope, and as long as there is hope, there is joy in living…….. well dont stop see dreams… thanks for ur comment

RASHID के द्वारा
October 23, 2010
    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    Rashid ji thanks a lot…

Ramesh bajpai के द्वारा
October 23, 2010

क्या तेरा दिल नहीं करता धरती पे आने का ?मगर में जानती हूँ वह कहेगा नहीं धरती पे आने से अच्छा में गायब ही हो जाऊ .. अगर मै उड़ पाती तो मामी को भी चिंता न होती की मेरी बेटी कहाँ गयी कब आयेगी .. मेरे जीवन में मेरे सबसे अच्छे दोस्त होते ये पंछी जिनके साथ दिन भर रहती अपने सुख-दुःख कहती और उनके सुनती… काश की मै उड़ सकती … मेरा मन उड़ना चाहता है . रौशनी जी आप तो कल्पना के पंखो पर सवार होकर अंनत की सैर करती ही है . आपकी अभिव्यक्ति ओश की बूंदों से नाजुक अहसासों को कितनी खूब सुरती से गढ़ती है . कविता तो कवि की उडान ही है बधाई

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    आदरनिये बाजपाई जी नमस्कार कविता तो कवी की उडान है ! वैसे पंख तो इस रूप में भी है मगर इसमें बस विचार उड़ते फिरते है हम धरती पे रहते है ……. अब बस इन्ही पेरों पे उड़ने की कोशिश करती राहगी.. आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए .. धन्यवाद सहित

chaatak के द्वारा
October 22, 2010

रौशनी जी, आपके मनोभावों को पढ़कर बड़ी ख़ुशी हुई, उड़ने की चाहत शायद हर इंसान के दिल में छिपी होती है| एक ऐसी उड़ान जिसमे हम स्वयं को परिदों की तरह महसूस कर सकें| मैं भी अक्सर हवा में उड़ने के ख्वाब देखता रहता हूँ| हालांकि कई बार आँख खुलती है तो अपने आपको बेड के नीचे पाता हूँ लेकिन फिर भी उड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और हमेशा उस सपने का इंतजार रहता है जब मैं उड़ सकूं| जहां तक उड़ कर ईश्वर तक पहुंचने वाली बात है उसमे मेरी सोच थोड़ी सी अलग है| आप उड़ कर या देह छोड़कर उसके नगर जाना चाहती हैं लेकिन मैं इसी दुनिया में स्वर्ग उतारना चाहता हूँ| आप एक दिन जरूर अपने सपने को साकार कर पाएंगी लेकिन क्या मेरा सपना सच होगा! आप मेरे लिए दुआ कीजिये कि मेरा सपना सच हो और मैं आपके लिए दुआ करता हूँ कि आपका सपना कभी सच न हो| आज आपने सचमुच मेरे मस्तिष्क के परिंदों को कुछ पल के लिए आजाद कर दिया| आभार!

    roshni के द्वारा
    October 23, 2010

    चातक जी, ये जानकर अच्छा लगा की आप भी उड़ने के सपने देखते है .. देखिये न हम कितने बी बड़े क्यों न हो जाये मन बच्चों जैसे सपने देख कर ही खुश होता है…और कितना आनंद अत है इस तरह की कल्पना करने में भी की हम उड़ रहे है …. दिल दिमाग को सकूं मिलता है ….. और मै आप के लिए जरुर दुआ करुगी की आपका सपना सच हो .. और हम सब भी इस धरती पर स्वर्ग देखे……. और आपकी मेरे लिए ये दुआ की मेरा सपना सच न हो मै भी एक दुआ बसी हुई है …. आपके विचार जानकर बहुत अच्छा लगा …… और इसी तरह अपने मस्तिष्क के परिंदों को कुछ पल के लिए आजाद करते रहा करियेगा


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