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गुम शब्द

Posted On: 8 Jul, 2010 में

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शब्द क्यों मेरे गुम सुम से हो गये है
जाने किन सोचो मे उलझ कर खो गये है …

रात भर इनको पकड़ने के लिए जगती रही
और कलम कागज़ को देख कर ये सो गये है…

बिखरे बिखरे से है दिल के सारे जज्बात
जब से मुझसे वह खफा से हो गये है….

तुम बताओ कैसे अब मै तस्वीरों मै रंगों को भरू
सारे रंग अब बे-रंग से हो गये है…

रौशनी अब तो अंधेरों से निकल
सब परिंदे सफ़र पे रवाना हो गये है…

चल आ उन शब्दों को तलाशे फिर एक बार
वोह कही जो गम के दरिया में खो गये है….

(रौशनी)

(Roshni)

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditi kailash के द्वारा
July 13, 2010

बहुत ही सुन्दर भाव…. आपने एक कवि व्यथा इतने प्यारे शब्दों में की, आप बधाई की पात्र हैं…

    roshni के द्वारा
    July 13, 2010

    अदिति जी शुक्रिया आपको कविता पसंद आयी , मुझे खुशी हुई . धन्यवाद्

    Jaylynn के द्वारा
    July 12, 2016

    I lielartly jumped out of my chair and danced after reading this!

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 12, 2010

रोशनी जी ! अति सुन्दर रचना…. आप इसी तरह लिखती रहें …. दो शब्द मेरे तरफ से स्वीकार करें ……. नदिया के किनारे मांझी की, उम्मीद जगाते है ; कुछ लिखते हैं भाव – चित्र , तस्वीर बनाते है |

    roshni के द्वारा
    July 12, 2010

    शैलेश कुमार जी , आपको रचना अच्छी लगीं तो मानो हमारा लिखना सार्थक हुआ | आप लोगों की हौसला-अफजाई ही तो हमारा संबल है | इतनी गहराई से पढने और प्रोत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया, धन्यवाद्

    Lonitra के द्वारा
    January 12, 2014

    Thanks for writing such an eattyso-unders-and article on this topic.

samta gupta kota के द्वारा
July 12, 2010

रौशनी जी,सुन्दर अभिव्यक्ति

Nikhil के द्वारा
July 12, 2010

अभी-अभी आपकी कविता पढ़ी. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर. रौशनी अब तो अंधेरों से निकल सब परिंदे सफ़र पे रवाना हो गये है… चल आ उन शब्दों को तलाशे फिर एक बार वोह कही जो गम के दरिया में खो गये है…. बहुत खुबसूरत पंक्तियाँ.

    roshni के द्वारा
    July 12, 2010

    निखिल जी आपको कविता अच्छी लगी शुक्रिया … इसी तरह अपनी अनमोल प्रतिक्रियाए देते रहिएगा… ताकि हम और अच्छा लिख सके धन्यवाद् निखिल जी  

anamika के द्वारा
July 10, 2010

आपको शब्द तलाशने की जरूरत नही.अप्पकी शब्द व्यंजना बहुत सुन्दर है

    roshni के द्वारा
    July 12, 2010

    आपको कविता पसंद आई अनामिका जी ये जानकर बहुत खुशी हुई .. आपकी प्रतिक्रिया का आगे भी इंतज़ार रहेगा…

chaatak के द्वारा
July 9, 2010

रौशनी जी, आपकी कविता पढ़ कर एक बहुत पुराना शेर याद आ गया- “जिंदगी की रेट पर तेरी ग़ज़ल लिखते हुए, रौशनी मेरे लिए मंझधार साहिल हो गया ||” अहसासात को जगाती बहुत ही अच्छी कविता है | बधाई !

    chaatak के द्वारा
    July 9, 2010

    रेट * – रेत

    roshni के द्वारा
    July 12, 2010

    चातक जी अपने मेरी कविता पढ़ी बहुत अच्छा लगा की आप जैसे बड़े लेखक नए writers की रचना को पढ़ते है और प्रोत्सहित भी करते है. बहुत बहुत शुक्रिया .. उम्मीद है इसी तरह आप अपने कीमती comments देते रहेगे ताकि हम और भी अच लिख सके . एक फिर से धन्यवाद् चातक जी……

Anju के द्वारा
July 9, 2010

बहुत सुन्दर कविता लिखी है अपने, ऐसा लगता है की आप ने अपने मन के किसी कोने मैंने छुपे हुए सच को वर्णित किया है. अच लगा की आप अपने मन के भीतर छुपे हुए भावों को इनती सरलता से व्यक्त किया है

    roshni के द्वारा
    July 9, 2010

    अंजू जी आपका धन्यवाद कैसे करू आप तो पहले दिन से ही मुझे प्रोत्साहन दे रही है.. बहुत बहुत शुक्रिया .. बस इसी तरह राह दिखती रहिएगा

mansi के द्वारा
July 9, 2010

बहुत अछी कविता लिखी है अपने मन के भावों को kush ही शमैं ब्दों समेट दिया है

    roshni के द्वारा
    July 9, 2010

    मानसी जी आपको कविता पसंद ई शुक्रिया, शायद ये मेरे ही नहीं सब के मन के शब्द है बस मैंने इनको कागज़ पैर उत्तार दिया है i

    Kyanna के द्वारा
    July 12, 2016

    How could any of this be better stated? It conltu’d.

rachna varma के द्वारा
July 9, 2010

बहुत खूबसूरत एकदम दिल को छू लेने वाली कविता 

    roshni के द्वारा
    July 9, 2010

    रचना जी आपको कविता पसंद आयी, धन्यवाद् .. आपके कमेंट्स मेरे लिए प्रोत्साहन है, कुछ और अच करने के लिए ..

    Christophe के द्वारा
    January 11, 2014

    Normally I’m against killing but this article slgurhteaed my ignorance.


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