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44 Posts

1,858 comments

roshni


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तारों का कारोबार

Posted On: 3 Jan, 2012  
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कविता में

47 Comments

इक पहेली सी हूँ

Posted On: 28 Dec, 2011  
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कविता में

58 Comments

“जैसा तुम चाहो -As U Wish “

Posted On: 21 Dec, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

40 Comments

सस्ते जज्बात

Posted On: 18 Oct, 2011  
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कविता में

58 Comments

बस सवाल ही है …..???

Posted On: 28 Sep, 2011  
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कविता में

68 Comments

और घर वीरान हो गया….

Posted On: 7 Jul, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

19 Comments

खंजर सा

Posted On: 6 Jun, 2011  
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कविता में

35 Comments

साजिश

Posted On: 28 May, 2011  
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कविता में

47 Comments

आदमी अख़बार है

Posted On: 6 Apr, 2011  
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कविता में

31 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: roshni

के द्वारा: dineshaastik

आपकr रचना के सम्मान में कुछ पंतियाँ- खुद में खुद को ढ़ूढ़ता, खुद को नहीं पाता। प्यास से लड़ने के लिये, सिन्दु तट जाता।। जितनी बुझाऊँ प्यास,उतनी ही अधिक बढ़े, इस  तरह  से  सारी  उम्र, प्यास  बढ़ाता। आयगा ये बिछड़ा हुआ,मैं देखता  गगन, अश्क आते आँख वो,वापस नहीं आता। कल्पना  के  पंख से, उड़ता हूँ  मैं गगन, सचमें वो रूह में मेरी,कुछ पल को समाता। मिलना  जरूर  है, बिछड़ो  से  एक  दिन, चाह से मिलते नहीं, वो  ही  है  मिलाता। खुद से ये गैर हो गये हम उसके प्यार में, मेरी समझ न आया वो क्यों प्यार बनाता। बन  गया  हूँ  मैं  पहेली,  खुद  के  लिये  ही, हूँ  'दिनेश'  ओर  मैं,  खुद  को  ही  जलाता।

के द्वारा: dineshaastik

के द्वारा: narayan sahni

रौशनी के राज़ रौशनी ही खोल पाती है रौशनी जी ! अंधेरों में वह क़ुव्वत कहां, कि रौशनी के राज़ तक पहुंच बना पाएं । और जहां रौशनी होगी, वहां कोई राज़ ही कहां रहेगा ? सब कुछ तो रौशन ही रहेगा, खुली किताब की तरह … आपकी नायाब कविताओं की तरह ! हम तो बस यही गुनगुनाएंगे, 'रौशन तुम्हीं से दुनिया, रौनक़ तुम्हीं जहां की … फ़ूलों में पलने वाली, रानी हो गुलिश्तां की … सलामत रहो … सलामत रहो … !!' अपनी बेहद खास पहचान वाली बेहतरीन कल्पनाशीलता और भावप्रवणता का एक और तोहफ़ा दोस्तों के बीच अता फ़रमाने के लिये आपका हार्दिक आभार । आपने हमेशा साबित किया है कि यदि भावनाओं में दम हो, तो शब्दजाल, भाषा और शैली उसके सामने पानी भरते से लगते हैं । बधाई !!

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: dineshaastik

के द्वारा: Ramesh Patel Anjana

के द्वारा: roshni

के द्वारा: idiot

प्रिय रोशनी जी, मैं आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। किन्तु अब इस तरह के मुद्दे उठाने से कोई लाभ नहीं, अपितु इससे अनेक तरह की समस्यायें पैदा हो सकी हैं। हमें इन विषयों को भूल कर आज की ज्वलंत मस्याओं पर विचार करना  चाहिये।क्योंकि जो हो चुका अब वह हमारे हाथ नहीं है। हाँ अब ऐसा कुछ न हो कि आगे की पीढियाँ सवाल  उठायें। मेरे सीमित ज्ञान के अनुसार काँग्रेस एवं नेहरू जी ने ऐसी अनेक गल्तियाँ की हैं, जिसका दुष्परिणाम  हमें आज भुगतना पढ रहा है। हम सभी जानते हैं कि देश के बटवारे का प्रमुख कारण नेहरू जी एवं जिन्ना जी  की प्रधानमंत्री पद की महत्वंकाक्षा थी।

के द्वारा: dinesh aastik

के द्वारा: Bijendra Singh

मैडम आधी - अधूरी जानकारी के साथ आपने वन्दे मातरम पर जबरदस्ती सुनहरा मुलम्मा चढ़ा दिया . यही मुद्दे का भगवाकरण है . आशा है आगे के आर्टिकल्स में आप इतिहास के साथ न्याय करेंगी . आपका कहना सही है लेकिन विवेचन तथ्यपरक नहीं है.. कृपया ध्यान दें इस प्रकार के विवेचन से सिर्फ पारस्परिक वैमनस्य ही बढ़ता है. इतिहास के साथ सबसे बड़ा न्याय यही रहेगा की सारी पुस्तकें जला दी जाएँ. हिन्दुओं और मुस्लिमों के बारे में अगर आपका लेखन है तो शायद साथ रहते हुए ४०० साल से ज्यादा हो चुके हैं. यदि आप कहते हैं की "जन-गण-मन" को आजाद भारत की पहली सरकार ने स्वीकार किया था तो मेरा अनुरोध बस यही है की यह मान के चलिए की आजाद भारत की पहली सरकार अंग्रेजों ( मुलाजिमों और चाटुकारों के साथ तत्कालीन विश्वराज -नीति ) के प्रभाव में गठित हुई. यह फैसला जन सामान्य का नहीं था. लेकिन क्या आपको आश्चर्यजनक नहीं लगता की यह आज तक कायम क्यों है? इसकी वजह भगवा ब्रिगेड है.

के द्वारा: rakeshmishra

के द्वारा: Hamza

के द्वारा: nagi

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

आपका बहुत बहुत शुक्रिया रोशनी जी इस यथार्थवादी लेख को साझा करने के लिए। टैगोर ये जानते हुए भी कि - वे अपने ही पावों पर मारे जाने के लिए कुल्हाड़ी तैयार कर रहे हैं, ने ये गीत उस समय के काले अंग्रेज़ों के दबाव और उनकी चाटुकारिता की अलभ्य इच्छा के चलते लिखा था। इस विषय पर हमारे ब्लॉगर बंधु चर्चित चित्रांश जी भी कई लेख लिख चुके हैं। कुछ सामग्री मेरे पास भी थी जो फ़िलहाल अनुपलब्ध है। ख़ैर आपका यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय एवं प्रेरणादायक है। राष्ट्र गीत के सच्चे हक़दार -वंदे मातरम- के साथ सरासर अन्याय किया गया है वह भी एक सोचीसमझी साज़िश के तहत। इस लेख को साझा करने के पीछे आपकी भावनाओं की कद्र करते हुए आपका आभार व्यक्त करता हूँ।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

लेख के तथ्यों में कहीं कोई गफ़लत नहीं है, जैसा कि ऊपर अबोध जी आदि ने शंकाएं प्रकट की हैं । इस विषय में टुकड़ों-टुकड़ों में हम आधी शताब्दी से पढ़ते चले आ रहे हैं । फ़र्क़ ये है कि किसी ने पहली बार दिलेरी और बेबाक़ी से तथ्यों को पूरे विस्तार के साथ रखने की कोशिश की है । हमारी आस्था रही है कि जब किसी मिट्टी की मूरत में भी प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाती है, तो वह स्वत: ही पूजित हो जाता है । ठीक उसी प्रकार चाहे जिस परिस्थिति में भी इन लाइनों को जब राष्ट्रगान के रूप में संवैधानिक रूप से प्रतिष्ठित कर दिया गया है, तो जबतक इसे संवैधानिक रूप से ही बदलकर कोई अन्य विकल्प प्रतिष्ठित नहीं कर दिया जाता, हम इसे सम्मान देने के लिये बाध्य हैं, क्योंकि यह हमारा राष्ट्रीय और नागरिक कर्त्तव्य है । तब तक यही कहा जा सकता है कि, जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ, और जब जाग जाएं, तभी सवेरा होता है । चान्डाल साम्राज्य के पतन के बाद ही इस दिशा में कुछ सम्भव हो सकता है । आज जनता इतनी भोली नहीं रह गई है कि लकीर का फ़क़ीर बनी रहे । इन लाइनों के विश्लेषण के बाद एक बच्चा भी प्रत्येक अभिप्राय को भली भांति समझ सकता है । आभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही

चाहे जिसका भी लिखा लेख हो, आपने प्रस्तुत किया है, इसलिये इस बेबाक़ प्रस्तुतिकरण के लिये आपको कोटिश: बधाइयां रोशनी जी । यह विडम्बना ही है कि अंग्रेज़ी हुक़ूमत के झन्डाबरदार ग़द्दार ही इस देश की भोली जनता के शरमाएदार बन गए, जिनकी बदबूदार लाशों को ढोने के लिये ये देश आज भी अभिशप्त बना हुआ है । यह जानते हुए भी कि स्विस बैंकों में ज़मा अधिकांश कालाधन इन ग़द्दारों की ही मिल्कियत है, इस देश की ग़ुलाम मानसिकता आज भी इनकी बेशर्म और ढीठ सत्ता द्वारा ही शासित है । ये मक्कार आज भी अपनी अधिनायकवादी नीतियों के शिगूफ़े नित्यप्रति उछाल रहे हैं, और बिकाऊ मीडिया उन्हें लपक-लपक कर जनता के जले पर नमक की तरह छिड़क रही है । कब तक हम सचमुच के आज़ाद देश में सांस लेने के क़ाबिल बन पाएंगे, कहना मुश्किल है । आभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: roshni

के द्वारा: rajesh

के द्वारा: roshni

के द्वारा: pramod chaubey

रौशनी जी नमस्कार, जे जे पर पुनर्वापसी पर आपका हार्दिक स्वागत है ! पूर्व की भांति इस बार भी आपकी रचना मैं जीवन के प्रति आपके दार्शनिक वैचारिक मंथन की झलक दिखाई देती है ! आपके सवालों को पढने के बाद मैं भी कुछ सोचने पर विवश हो गया और अंत मैं निष्कर्ष ये निकाला की जिन्दगी केबीसी की भांति एक खेल हैं और इस खेल का होस्ट अमित जी नहीं शायद भगवान् है जिस प्रकार केबीसी मैं पूछे जाने वाले हर सवाल का जवाव पहले से ही तय होता है उसी प्रकार जीवन के हर सवाल का कोई न कोई जवाव होता अवश्य है और हम मैं से जो भी प्रतियोगी इन सवालों के जवाव जितनी ज्यादा अच्छे से देंगे वो उतने अच्छे से इस जीवन के खेल मैं आगे बढ़ेंगे .. बस जरुरत है हमें ईश्वर के पूछे गए हर सवाल पर आत्म मंथन की है .. जिससे हम इस खेल मैं आगे ... आगे और आगे बढ़ते जाएँ ... और आप भी इसी प्रकार अच्छा अच्छा और अच्छा लिखती जाएँ ...

के द्वारा: allrounder

के द्वारा: deepa

के द्वारा: Gracelyn

डॉ जी , भारत की ८० % आबादी मे से काफी आबादी गाँवों से अब शहर में आ गयी है.... हालत काफी बदल गए है .. अगर १०० लोगों में से ३० लोगों ही ऐसे होते है जो माबाप की सेवा नहीं करते ... लेकिन उनमे भी अगर सही से देखा जाये तो वोह माध्यम वर्गीय है ... उनकी माँ ने उन्हें दूध भी पिलाया होता है और मल मूत्र भी साफ किया होता है ... उनके लिए रातों को जगी भी होती है ........... उनके पिता ने उनको पालने के लिए दिन रात एक किया होता है ......... इसलिए माँ बाप या कुछ alerta modern लोगों की example देकर आप इस काम को सही नहीं कह सकते ......और अपनी जिमेवारी से पीछा नहीं छुड़ा सकते... ..... आपके विचारों की मै कदर करती हूँ क्युकी हो सकता है अपने कुछ ऐसा देखा जो मैंने नहीं और जो मैंने देखा वोह अपने नहीं इसलिए आपकी बेबाक राय मुझे काफी अच्छी लगी ......... उम्मीद है की आगे भी बेबाक राय मिलती रहगी

के द्वारा: roshni

मैं आपके लेख से सहमत नहीं हूँ । भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है, और वृद्ध माता-पिता अपने पुत्रों और बहुओं द्बारा सेबा भी हासिल करते हैं । आपके द्वारा बताई गई समस्या केबल अतिशिक्षित वर्ग या यों कहें कि एडबांस फेमिली में ही है । जिस परिवार की मातायें अपने पुत्र को अपना दूध न पिलाये, इसलिये कि उसकी फीगर खराब हो जायेगी, गोद में न ले कि वह मल-मूत्र कर देगा, अथवा उसके साथ खेलने का भी समय न हो, वह बच्चा बड़ा होकर क्या करेगा । जिस बच्चे ने अपना बचपन नहीं जाना, जो होश सम्हालते ही अपने माता-पिता के महत्वाकांक्षाओं की बलि चढा, उससे आप क्या उम्मीद करते हैं ।  जिस बच्चे के माता-पिता ने अपने पारिवारिक या सामाजिक दायित्वों को कभी न निभाया, वह अपने बच्चे से यह उम्मीद क्यों करते हैं । आप बचपन से ही उसे पश्चिमी सभ्यता में ढालते हैं, तो खुद भा ढलिये । अगर मेरी बेबाक राय से आपको दुख हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ ।

के द्वारा: Dr. SHASHIBHUSHAN

रौशनी जी, कविता हो या कोई गद्यात्मक रचना, आप की कृतियों के विषय में शब्दों में लिख पाना मेरे लिये हमेशा दुष्कर रहा है । क्योंकि अल्फ़ाज़ में छिपे जज़्बात इतने गहरे होते हैं कि अल्फ़ाज़ उनमें कहीं विलीन हो जाते हैं । ऊपर की लाइनों के शब्द भी इनमें छिपी भावनाओं के आगे कुछ बौने से ही हैं । परिन्दे क्या बग़ावत करेंगे, वे निरीह प्राणी तो बस यही गुज़ारिश करते होंगे कि मालिक़ की दया से उनके आका का अगला कदम उनके अस्तित्व के लिये कहीं कोई और झटका तो साबित नहीं होने वाला ! बहुत दिनों बाद एक बहुत उम्दा रचना । अफ़सोस है कि आपकी रचना के विषय में फ़ेसबुक से पता चला, और मैं खुद को रोक नहीं पाया । कुछ सांसारिक जंजाल मुझे नियमित नहीं होने दे रहे हैं, निज़ात मिलते ही मैं भी लिखना शुरू करूंगा । बस ख्वाहिश है कि आप पूर्व की भांति ही लिखती रहें । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: kanchan chhatrashali

के द्वारा: md dilshad khan saudia

के द्वारा: vishnu

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: saurabhsinghji

रोशनी जी पड़कर अच्छा लगा आपने काफी खूबसूरत अंदाज़ में प्यार को लिखा ! जो में आगे लिखने जा रहा हूँ पहले तो उसके लिए आप से माफ़ी चाहूँगा उम्मीद है आप मेरी गुस्थाकी को माफ़ कर देंगी. "परछाईयां हमेशा साथ रहती है आईने टूट जाया करते है.. दिल के बंधन चलते है उम्र भर दूर तलक दिमाग के रिश्ते राह में छूट जाया करते है…." क्या खूब लाइन है- एक बात कहू - जब हमें अपनी परछाई की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, (अँधेरे में) तभी वो हमारे साथ नहीं होती और आईने टूट के भी आपका साथ नहीं छोड़ते, बल्कि वो टूट कर अपने हर टुकड़े मैं आप के ही जीते है. दिल के रिश्ते अक्सर खो जाते है जैसा की आप ने खुद लिखा है, हम एक दुसरे की कमियां गिनने लगते है! दरअसल अगर दिल की जगह दिमाग से काम लिया होता तो वो साड़ी कमियां प्यार करने से पहले ही नज़र आ जाती! दो अधूरे लोग बिलकुल एक जैसे नहीं हो सकते इसलिये अगर वो बड़ी चाहतो से एक हो भी जाये तो शायद जो चीज़ बनेगी वो आगे जाकर किसी न किसी के नज़रों में तो खटकेगी, हाँ दो पूर्ण लोग अगर एक दुसरे की बाहों में बाहें दाल के भी चले तो उनके बीच का सामंजस्य देखने लायक होगा! तो शायद मुझे तो एक आईने की ज़रुरत है जो हर हाल में मुझे मेरा चेहरा दिखा सके (टूटने पर भी) , न की वो साया जो ज़िन्दगी में अँधेरा घिरते है साथ छोड़ दे! आपका प्यार आपके साथ ताउम्र बना रहे ये दुआ है मेरी! और स्वागत है आपके मेरे ब्लॉग में!

के द्वारा: Prakash Kharayat

के द्वारा: Deepak Jain

रौशनी जी, ब्लाग लेखन के समय आपकी भावनात्मक अभिव्यक्तियां बेजोड़ होती हैं, इसको यूं ही बढ़ाती रहिये । वैसे तथ्य यह है कि दिमागी रिश्ते सिर्फ़ तिज़ारत में काम आते हैं, प्यार में नहीं । प्यार में भावनाओं को पैदा नहीं करना पड़ता, वे खुद-ब-खुद पैदा होती हैं । लेकिन तिज़ारत में आदमी जैसी चाहे वैसी मुस्कुराहट अपने होठों पर लाकर दिखा सकता है, एक चतुर सेल्समैन की तरह, जहां जैसा एप्लीकेबल हो । यह प्रतियोगिता भी एक तिज़ारत ही तो है, वरना प्यार में कैसा सौदा ? जहां अंकगणित का खेल होगा, भावनाएं वहां से कोसों दूर होंगी । दोनों का छत्तीस का आंकड़ा होता है । प्यार की सच्चाइयों का आईना दिखाने के लिये आप को ढेर सारी बधाइयां ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: rajeev dubey

के द्वारा: मनोज

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Deepak Jain

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Tufail A. Siddequi

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Deepak Jain

के द्वारा: ashishtiwari

के द्वारा: roshni

के द्वारा: rktelangba

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: dr manoj rastogi

के द्वारा: mansi

रोशनी जी, नमस्कार! क्षमा मांगने जैसी कोई बात नहीं है क्योंकि मेरे ब्लॉग में कहीं भी मेरा नाम नही लिखा था, वह तो मै प्रतिक्रियाओं में अपना नाम लिखने लगा जिस से सब को पता चला | आपका प्रश्न है कि- ' जिन लोगों को बहुत खांसी आती है और खासी पुरानी भी हो उन्हें योग करना चाइए या नहीं?' इस सन्दर्भ में बताना चाहूँगा कि सबसे पहले यह पता लगाना जरुरी है कि उनकी खांसी का कारण क्या है , यदि यह किसी संक्रामक रोग जैसे ' क्षय रोग ' की बजह से है तो योग में आसन न करके केवल अनुलोम विलोम प्राणायाम करें, इससे क्षय में बहुत लाभ होगा | सामान्य खांसी में जिस समय खांसी कंट्रोल में हो उस समय योग आसन कर सकते हैं क्योंकि आसन में श्वास-प्रश्वास का बहुत महत्व है , खांसी की अवस्था में श्वास का नियमन नहीं हो सकता इस लिए जिस समय खांसी कंट्रोल में हो उसी समय आसन करें , खांसी आने पर आसन रोक दें | सामान्य होने पर पुनः शुरू करें | डॉ. कैलाश द्विवेदी

के द्वारा: naturecure

निशा जी नमस्कार , हर रिश्ते में समझोते तो करने ही पड़ते है मगर मेरे ख्याल से माता पिता बच्चे के जनम से लेकर उसके विवाह तक काफी समझोते कर चुके होते है ...... फिर संतान थोडा सा क्यों नहीं झुक जाती .......माता पिता एक बहुत लम्बी उम्र जी कर बुढ़ापे तक आते है और इस awastaha में परिवर्तन शायद मुमकिन नहीं क्युकी वोह कही गहरे जुड़ जाते है अपने आदतों और सवभाव से ..... लेकिन प्रश्न ये है की बच्चे तो शुर से माँ-बाप के साथ रहेते है उनकी आदते जानते है यानि की कुल मिलकर सब कुछ जानते है फिर कहाँ पर जाकर विरोध पनपता है .... कहाँ पर जाकर संतान अपने माँ-बाप को बोझ समझती है ........ संतुलन जरुरी है और संतान का माँ-बाप के प्रति फर्ज भी ...... आपके विचार जानकर बहुत अच्छा लगा धन्यवाद सहित

के द्वारा: roshni

रौशनी जी नमस्कार यह एक ऐसा विषय है जिस पर जितना भी लिखा जाये रौशनी जी कम है पर हमारा लिखना जब सफल हो जब हमारे युवा इस को समझ जाये की यह एक ऐसी अवस्था है जिस पर सभी को आना है ! एक कहानी सुनाता हूँ ऋषिकेश की है वहा पर एक पहाड़ी पर एक गाव था मह्दुल्ला पुर जिसमें एक उम्र पार करने पर बुजर्ग को टोकरी में बिठा के उसको पहाड़ी पर घने जंगल में छोड़ आया करते थे जिससे उनको जंगली जानवर खा जाये और परिवार को उनसे मुक्ति मिलें एक दिन जब एक परिवार का जवान अपने बुजर्ग पिता को टोकरी में लेकर चला तो साथ में उसका लड़का जाने की जिद करने लगा उसके पिता ने बहुत मना किया पर वो नहीं माना अंत में वो उसको ले जाने को तैयार हो गया जब वो अपने पिता को पहाड़ी पर छोडके वापस मुड़ा तो उसने अपने पिता से अपने दादा को वहा छोड़ने का कारन पूछा उसके पिता ने कहा यही परंपरा है अच्छा तो वो भागा भागा गया दा दा को प्यारी करी और उनसे टोकरी से उतर जाने को कहा दा दा ने टोकरी से उतरने का कारन पूंछा तो उसने कहा जब में अपने पिता को छोड़ने आऊंगा तो फिर से टोकरी खरीदनी पड़ेगी इससे अच्छा है इस टोकरी को ले जाऊं वैसे भी इस टोकरी का आपको अब कोई काम नहीं यह सुन कर लड़के का पिता अवाक रह गया उसकी आँखों से आंसू निकल आये और उसने पिता से मांगी और उनको अपने घर वापस ले आया ! इस तरह वहां पर इस प्रथा का अंत हुआ ! कुछ लोग कहते है की बुजर्ग माता पिता आज कल के माहोल को समायोजित नहीं कर पाते तो उनसे में पूछना जरूर चाहूँगा बच्चे से लेकर बड़े होने तक, यही नहीं उनको पैरों पर खड़ा करने तक माता पिता कितना सहन करते है कितना समायोजित करते है ये सभी जानते है और जब उनके सहन करने की बारी आती है तो वे हाथ खड़े कर देते है और उनको अपने में समायोजित न होने की दुहाई देते है फिर भी अंत में ऐसे लोगो से यही कहना चाहूँगा ! जैसा करोगे वैसा भरोगे -----जैसा बओगे वैसा काटोगे आशुतोष दा

के द्वारा: ashutoshda

विनोद जी नमस्कार , ये सही है की हर सिक्के के दो पहलु होते है, मगर यहाँ ये बात शायद लागु नहीं होती क्युकी अक्सर देखा गया है की माद्यम वर्गीय परिवार में पिता ही कमाते है और माता घर संभालती है बच्चों की पूरी तरह से देखभाल करने के बाद भी अपना पेट कट कर कर उन्हें बड़ा करने के बाद अगर बच्चा ये कहकर उनसे पीछा छुड़ाना चाहे की उन्हें उचित संस्कार नहीं मिले तो ये गलत है ............ संस्कार कारन नहीं है कारन शायद कुछ और है और वोह है जिमेदारी की भावना ...... जो आज युवा उठाना नहीं चाहते बस अपने में मस्त रहना चाहते है ...... आपने सही कहा की अभी और चिन्तन की जरूरत है ........ आपके विचार जानकर अच्छा लगा धन्यवाद सहित

के द्वारा: roshni

अबोध जी, कोई क्लास नहीं, इसे भी ह्यूमर के तौर पर ही लेने का कष्ट करें । दरअसल मैंने ऊपर नीचे के सभी कमेंट्स पर रौशनी का जवाब देखा, बीच में आप पर कोई जवाब उन्होंने नहीं लिखा था । बस ध्यानाकर्षण का मुझे एक तरीक़ा सूझा, जो लिख दिया । यह तो नहीं न लिख सकता था कि रौशनी तुमने अबोध जी के कमेंट का जवाब क्यों नहीं लिखा । वह लड़की है और खुले दिमाग की है इसलिये हम लोग थोड़ा हद से ज़्यादा ही शेरो शायरी लिख देते हैं, यह मानते हुए कि बुरा नहीं मानेगी, और उसने अभी तक किसी को कोई उल्टा जवाब लिखा भी नहीं है । रही राज जी की बात, तो मैंने आज तक कभी रौशनी और राजकमल को एक दूसरे के ब्लाग पर कोई कमेंट लिखते हुए नहीं देखा, जबकि दोनों ही मुझसे भी बहुत पुराने ब्लागर हैं । कभी दोनों अच्छे मूड में रहे तो पूछ कर बताऊंगा । वैसे भाई साहब को तो आप जानते ही हैं । धीरे-धीरे आपसी समझ बढ़ने के बाद लोग खुलकर उनसे सटने लगे है, वरना वह करंट के झटके से कम तो हैं नहीं । उम्मीद है आप और मैं एकदूसरे को अच्छी तरह समझते हैं, और आपने मेरी 'क्लास' को अन्यथा नहीं लिया होगा । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: roshni

रोशनी जी, नमस्कार क्या खूबसूरती से आपने ईश्वर की सत्ता पर प्रश्न उठाये हैं और फिर उससे भी ज्यादा खूबसूरती से उन्ही प्रश्नों का उत्तर भी दिया है ! मुझे लगता है हम सब ईश्वर के हाथ की कठपुतलियां हैं दुनिया मैं सिर्फ अपना - अपना पार्ट निभाने यहाँ आये हैं जिस दिन हमारा पार्ट ख़तम उस दिन वेह सर्वशक्तिमान प्रभु एक झटके से डोर खींच लेता है और हमारा खेल ख़तम ! लेकिन ये ऊपर वाला कभी - कभी ये भूल जाता है की उसने मनुष्य को एक दिल भी दिया है और जाने वाला अपने पीछे छोड़ जाता है ऐसे ही दिल मैं यादें जिनके सहारे हमें जिन्दगी गुजारनी पड़ती है , कभी अपनी ख़ुशी के लिए कभी अपनों की ख़ुशी के लिए ! हम सभी उसके अधीन हैं और उसके बनाये नियमों को हमें मानना ही पड़ेगा ! एक बार फिर से मन के सच्चे उदगारों के लिए बधाई !

के द्वारा: allrounder

के द्वारा: Deepak Jain

के द्वारा: Anuradha chaudhary

के द्वारा: roshni

रौशनी जी, समझ नहीं पा रहा कि पहले किसकी तारीफ़ की जानी चाहिये । उस खुदा की, जिसकी इल्तज़ा में आपने इतनी सुन्दर रचना गढ़ दी, या खुदा की उस रचना की, जो आज हमारे सामने ब्लाग अवेटर पर नई तस्वीर के रूप में एक नई ताज़गी का एहसास करा रही है । काव्य रचना तो खैर हमेशा की तरह अपनी पूर्ववर्ती पर भारी पड़ ही रही है । तस्वीर की तारीफ़ की जगह ये पंक्तियां अर्ज़ हैं -- रंगों में तेरा अक्स ढला, तू ना ढल सकी, सांसों की आंच ज़िस्म की खुशबू ना ढल सकी, तुझमें जो लोच है मेरी तहरीर में नहीं, तहरीर में नहीं, जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं ॥ … रौशनी जी, गीत की लाइनों में जो ग़ुस्ताखियां हैं, उनके लिये क्षमाप्रार्थी भी हूं । क्या करूं, गानों के अतिरिक्त कुछ आता नहीं, और गाने किसी मशहूर शायर के लिखे हुए हैं, मेरे नहीं । बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

हाँ रोशनीजी मुझे वह लेख भी मिल गया है जिसका जिक्र मैंने अभी किया था. इसे नीचे पेस्ट कर रहा हूँ. जागरण ब्लॉग के सम्पादकों को एक शिकायत पत्र पोस्टेड ओन: November,18 2010 कविता में आदरणीय संपादक महोदय, जैसा की आपको पता है की आजकल जागरण मंच का माहौल ठीक नहीं चल रहा है उसी सम्बन्ध में मई ये पत्र आपको लिख रहा हूँ….और उम्मीद करता हूँ की इस ओर अवश्य ध्यान दिया जाएगा..आपके सामने मै कुछ नाम प्रस्तुत करने जा रहा हूँ जैसे..Zhanqidbcomu,,,,jqebumcf….urlnoad….paitbhulmr क्या आप सब नहीं देख रहे है या फिर देखते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहा है..आजकल कोई भी पोस्ट डालिए और दस से पन्द्रह मिनट में वो पोस्ट तीसरे पन्ने पर पहुँच जाता है और फिर कुछ घंटों बाद उसका अस्तित्व ही ख़तम हो जाता है और जब हम सभी पाठक जो की लगभग सभी अपने व्यस्त समय में से समय निकाल कर जब ब्लॉग पर पहुँचते है तो उने कुछ उलटे सीधे नामो से पटा जागरण ब्लॉग एक शोशल नेटवर्किंग साईट की तरह दिखाई पड़ता है…और हम सब अपनी मेहनत से बनाये गए किसी पोस्ट को पोस्ट करने के बाद उसकी धज्जी उड़ते हुए देखते है…..आप तो जानते ही होंगे की एक रचनाकार की अगर रचना को कूड़े में फेंक दिया जाए जो की अगर उस काबिल न हो तो उसके लिए उससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता क्योंकि एक रचनाकार की साँसे उसकी रचनाओं में बसी होती है…अगर मै या फिर यहाँ पर मौजूद सभी लोग चाहे वो आदरणीय शाही जी हो..श्री बाजपाई जी या फिर चातक जी….बहुत से बहत ही उत्कृष्ट रचनाकार है जो की अपनी किसी भी लेखनी को अगर जागरण मंच पर डालते है तो कुछ सोच समझ कर ही डालते है उन्हें पटा होते है की उनके डाले हुए पोस्ट को उचित सम्मान मिलेगा…मगर ये क्या रचना कब आई कब गयी किसी को पटा भी नहीं चला अगर रचना फीचर हो गयी तो ठीक अन्यथा रचना पहुँच गयी कूड़ेदान में….. मेरा मानना है की इस समस्या से सभी लोग परेशान होंगे..तो मै जागरण मंच के सम्पादक जी से सीधे तौर पे पूछता हूँ की इसका निराकार होगा या नहीं .क्योंकि अगर इसका निराकरण न हुआ तो मै तो जागरण मंच से चला जाऊंगा….. मै जागरण मंच के सभी पाठको से अनुरोध करता हूँ की वो मेरे सुर-से-सुर मिलाये और जब तक इस समस्या का निराकरण नहीं hota tab tak apni koi bhi lekhni post n kare ……maine to bahut dino se apni koi rachna post nhi ki....aaj samay nikaal kar ye ptra likh raha hun… Aakash Tiwaary

के द्वारा: राजेंद्र रतूड़ी

रोशनी जी, अभी किसी सज्जन ने २-३ दिन पहले ही जागरण जंक्शन पर ही संपादक मंडल को लिखा था की लोग फेक आइ. डी. से ब्लॉग बना लेते हैं और हाल ही में हम कुछ लोगों की फेसबुक पर भी चर्चा हुई थी की लोग अपने प्रोफाइल पर किसी सेलेब्रिटी की या कोई और फोटो लगा कर लिखते हैं, इसलिए ऐसा आपको लिख दिया. इसका कोई और अभिप्राय नहीं था. फेसबुक के मित्रों की गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए मैं किसी का नाम तो नहीं लिख सकता लेकिन कुछ मित्रों के विचार आपको भेजने की कोशिश कर रहा हूँ. और उसका निष्कर्ष यह था की जिनको लेकर यह चर्चा शुरू हुई थी, उन्होंने इस बात को स्वीकार कर लिया था. लेकिन जरूरी नहीं की आप भी इसे माने. कुछ चुनिन्दा टिप्पणियां जिनमे पुरुष और महिलाएं दोनों हैं निम्न प्रकार हैं- -mujhe bahut koft hoti hai aise logon se jo facebook me dost to banana chahte hain , par apni asli photo lagane se bhi ghabrate hain ya fake foto laga kar sabko gumrah karte hain, aap sab bhi sayad mere saath sahmat honge. -मैंने अपना फ़ोटो लगा लि‍या, अब मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ । -maine ek model ka photo net se lift karke lagaya kyonki iske gestures achchhe लगे. -Ye log facebook ke liye jashushi karte hain sayad. Bhesh badal badal kar prakat hote hain. -Ek photo ko leker itne bawal ki jarurat kya hai, dosti to dil se hoti hai jab dil he nahi mila to photo kya karegi. Har insan apne hi najariye se sochta hai, galt insan galt najariye se aur sahi insan sahi najariye se. -............ ji tabhi to .......... ji ne likaha hai ki sahi photo lagane se darr kyon..? jab dosti dil se hoti hai. Jab lagani hi hai to kisi or ki photo kyon..? -bilkul aap sahi kah rahe हैं -chehra insan ka vyaktitva ko jahir kartee hai. nam se kya information se kya ? jab dost banna hai to muh chipa kar q .. -main aapse ekdam sahmat हु -Bilkul sahi kaha aapne. Khastaur par mahilayen pata nahi kyon apni soorat dikhane se ghabraati hain. Bhagwan ne sabhi ko sundar banaya hai aur jaisa banaya hai use sweekar karna chahiye. -Aap ne to mere man ki कही -i am agree with you Sir....and i think this is not a good habbit....and they are a low mind person..... -................ji lagta hai aap logo ne than liya hai ki mujhe ghar se bahar nikal kar hi dam lege, thik hai dosti ke liye sab karna pdta hai. Lekin photo lagane ka dar se kya rishta hai ye to man ki bat hai. -hum sab koi na koi vichar rakhte hain, yeh theek hai ki hum alag alag social, political & economical background se aate hain , isiliye vicharon me bhi bhinnta hai, par adhikans ne kaha ki jab hum social site par ho to khyal rakhe ki social riste nibhayen aur social riste muh chupa kar nahi nibhaye ja सकते

के द्वारा: राजेंद्र रतूड़ी

रोशनी जी, आपकी खामोशी ने जैसे एक कानफ़ाड़ू शोर के साथ टेक आँफ़ करते विमान को आकाश के हज़ारों फ़ीट ऊपर के बियाबान में पहुंचा दिया हो, जहां पहुंचने के बाद सब कुछ थम कर शान्त और निर्विकार हो जाता है । कहां वह शोर और सीट बेल्ट का बंधन, और फ़िर एकाएक ही सारे बंधनों से मुक्ति के साथ चारों ओर रुई के गालों जैसे स्थिरचित्त बादलों के बीच तैरने की अनुभूति । फ़िर मधुर संगीत के अतिरिक्त सब कुछ बेहद खामोश, और खामोशी की चादर में लिपटी जीवन-यात्रा, चन्द लमहों की ही सही । यही तो असली चाहत होती है हमारी, जिसकी तलाश में हम एक नामालूम सी भागमभाग और छीना झपटी में व्यस्त हैं । रोचक और प्रेरणास्पद आलेख । साथ ही आपकी एक नई प्रतिभा से परिचय भी । बधाइयां ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय रौशनी जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

रोशनी जी ,बहुत दिनों के बाद आज आपका लेख पढ़ा .आजादी के 63 साल बाद भी हमारे देश के अधिकतर लोग BPL(BELOW POVERTY LINE ) नीचे रहने को विवश हैं. बिजली पानी जैसी मुलभुत सुविधाओ की अब भी जरुरत बनी हुई हैं. मेरा ऐसा नहीं कहना हैं विगत वर्षो में विकास नहीं हुआ विगत वर्षो में विकाश के बहुत से कार्य हुए हैं लेकिनजिस रफ़्तार से होने चाहिए थे नहीं हुए हैं .वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने कहा था की यदि विकास कार्य सही से होते तो आठवी पंचवर्षीय योजना की जरुरत ही नहीं पड़ती .उनके कहने का मतलब की हर जगह भ्रष्टाचार हैं .राजीव गाँधी ने कहा था की केंद्र से चला एक रुपैया जिला से पंचायत तक पहुचते-पहुचते इतना कम हो जाता हैं की उतना में विकास हो पाना मुस्किल हैं. भ्रष्टाचार ने हमारी व्यवस्था को दीमक की तरह चाटता जा रहा हैं. हमारे नेतागण भी वाही कर रहे हैं. इसके लिए युवा वर्ग को जगाना होगा. क्यूँ की परिवर्तन तो युवा ही करते हैं. बढ़िया पोस्ट बधाई अमित कुमार गुप्ता हाजीपुर ,वैशाली , बिहार आप मेरे लेख पढ़ने के लिए इस ADD पर जा सकते हैं. . www.amitkrgupta.jagranjunction.com

के द्वारा: Amit kr Gupta

के द्वारा: roshni

के द्वारा: madhvi srivastava

वाह-वाह-वाह-वाह...अब इससे ज्यादा क्या कहूँ..आदरणीय मिश्र जी ने तो इकदम सही कहा की "बहुतों को अपनों बीता हुआ कल याद कराया होगा इन पंक्तियों ने" आपकी इन लाइनों के एक-एक शब्द ने शरीर में जो तरंग दौड़ाई है ,एक आग जो की लगभग बुझ ही रही थी उसको ऐसा धधकाया है आपने की क्या कहूँ,,ज्यादा बोलता हूँ तो लोग गलत समझेंगे...कम बोलता हूँ तो भी....... मगर इतना जरूर कहूँगा....की आपकी ये कविता मुझे सैकड़ों कविता लिखने पर मजबूर करेंगी....क्योंकि ज्यों-ज्यों बातें याद आएगी हर एक लम्हा...नयी रचना कर डालेगी.....आप की इन पंक्तियों पर आपको तहे दिल से बधाई भगवान करे आपकी कलम की श्याही हमेशा बनी रहे,,,... सोचता हूँ इस बार भी दो शब्द कहूँ मगर आपकी रचना के आगे फीके ही नजर आयेंगे.... "नासूर बना है जीवन मौत का ख़्वाब हर पल मेरे मन में है, वो जख्म देने वाली बेवफा आज भी मेरे दिल में है"... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: Manish Singh "गमेदिल"

रोशनी जी समझ नहीं पा रहा कि आपकी उस कल्पना की तारीफ़ करूं, जो साबित कर रही है कि यदि कल्पना में दम हो तो किसी गद्यात्मक रचना में भी कविता से अधिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है । या आपकी अभिव्यक्ति-कला की तारीफ़ करनी चाहिये, जिसने कल्पना को भी जीवन से लबरेज़ कर दिया है । अज़ीब सा खिंचाव महसूस हो रहा है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । कम्प्यूटर से कुछ दिन दूर ही रहने की सलाह के बावज़ूद आपकी इस रचना पर टिप्पणी लिखने से खुद को रोक नहीं पाया । आपकी सीधी सादी दिखने वाली रचनाओं की कल्पना परछाइयों से प्यार भी करती है, और दूसरों के हृदय में उसका एहसास जगाने के लिये मजबूर भी कर देती है । बहुत-बहुत बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: roshni

के द्वारा: vijay kumar

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Coolbaby

रौशनी जी, आपके मनोभावों को पढ़कर बड़ी ख़ुशी हुई, उड़ने की चाहत शायद हर इंसान के दिल में छिपी होती है| एक ऐसी उड़ान जिसमे हम स्वयं को परिदों की तरह महसूस कर सकें| मैं भी अक्सर हवा में उड़ने के ख्वाब देखता रहता हूँ| हालांकि कई बार आँख खुलती है तो अपने आपको बेड के नीचे पाता हूँ लेकिन फिर भी उड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और हमेशा उस सपने का इंतजार रहता है जब मैं उड़ सकूं| जहां तक उड़ कर ईश्वर तक पहुंचने वाली बात है उसमे मेरी सोच थोड़ी सी अलग है| आप उड़ कर या देह छोड़कर उसके नगर जाना चाहती हैं लेकिन मैं इसी दुनिया में स्वर्ग उतारना चाहता हूँ| आप एक दिन जरूर अपने सपने को साकार कर पाएंगी लेकिन क्या मेरा सपना सच होगा! आप मेरे लिए दुआ कीजिये कि मेरा सपना सच हो और मैं आपके लिए दुआ करता हूँ कि आपका सपना कभी सच न हो| आज आपने सचमुच मेरे मस्तिष्क के परिंदों को कुछ पल के लिए आजाद कर दिया| आभार!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: soni garg

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: roshni

क्या भाव हैं रोशनी जी, गज़ब । सुबह-सुबह एक अच्छी रचना से साक्षात्कार हुआ, रविवार सफ़ल हो गया । वैसे मेरा मानना है कि खुदा को ढूंढने या पाने के लिये खुद को नहीं, सिर्फ़ अपनी खुदी को मिटाना होता है, जिसे हम अहंकार कह सकते हैं । यही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन होता है, और अनुचित अपेक्षाएं हमारी बेड़ियां । खुदा और महबूब दोनों ही कभी संगदिल नहीं होते । यदि होते, तो हमारे दिलों के तार नहीं जुड़ पाते । उस खुदा को किसी ने नहीं देखा, फ़िर भी सारी दुनिया इसीलिये उसके पीछे पागल है, क्योंकि वह बेदिल नहीं है । सभी उसके, और वो सबके दिलों में वास करता है । लेक्चर थोड़ा लम्बा हो रहा है, माफ़ी चाहूंगा । बेहद खूबसूरत रचना के लिये हार्दिक बधाइयां ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Mansi

के द्वारा: roshni

के द्वारा: Pooja

के द्वारा: Rakesh

के द्वारा: roshni

सुश्री रोशनी जी, आजादी के विचारों को हम तक पहूँचानें का शुक्रिया । लेख वाकई बहुत अच्‍छा है । लेंकिन इसी मंच पर माननीय श्री ओ.पी.पारीक ने अपने ब्‍लॉग http://oppareek43.jagranjunction.com में लिखा है और मैं उसे उद धृत कर रहा हूँ कि - 63 साल बाद भी हम नहीं सुधरे. याने आज भी सियासतदानों की चाल में आ कर फिरकापरस्ती की और रुख कर लेते हैं. 15 अगस्त सिर्फ आज़ादी का जश्न भर नहीं है बल्कि उस बर्बादी से सबक लेने का जश्न भी है जिसके घाव अभी तक नहीं भरे हैं.. आज हम आज़ाद जरूर हैं पर इस आज़ादी का दुरुपयोग निश्शंक हो कर कर रहे हैं मसलन :- आगे उन्‍होंनें करीब 10 कारण गिनाएं हैं । जहां आजादी की यही पीड़ा व्‍यक्‍त होती नजर आती है जो आपके लेख में है । तथापि आपके लेख का अंत एक पाजिटिव सोच के साथ होता है । बहुत अच्‍छा लेख है । अरविन्‍द पारीक (भाईजी कहिन)

के द्वारा: ARVIND PAREEK

के द्वारा: rita singh 'sarjana'

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: roshni

के द्वारा: rashmi negi

के द्वारा: rashmi negi

Shaliesh जी आपकी इतनी अच्छी टिप्पणी ने बहुत कुछ साफ़ क्र दिया....... ये सच है की संघर्ष सभी को करना पड़ता है किसी को कम और किसी को ज्यदा ... मगर जहाँ तक शिक्षा में जायद पैसा खर्च करना या कम खर्च की बात है तो कई बार ऐसे भी स्टुडेंट होते है जिनके माँ-बाप उनपर ज्यदा पैसा नहीं खर्च सकते हाँ मगर अच्छी शिक्षा दिला कर उन्हें काबिल बने की पूरी कोशिश करते है और उनका जीवन के लिए संघर्ष मेरे लिए कही जायदा पैसा खर्च के पड़ने वालों के मुकबले ज्यादा मुश्किल है...... बाकि अंत तो वही है नौकरी मिल गयी तो ठीक वरना कुछ भी कर लो मूल्य न पड़ेगा ..... धन्यवाद इसी तरह अपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाते रहियेगा.. आभार सहित

के द्वारा: roshni

सोनी जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया और मै आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ .. आपको ब्लॉग संसद जैसे ब्लोग्स का मेंबर बनने ऑफर भी मिला इस के लिए आपको बहुत बहुत बधाई .. लेकिन मै यहाँ अपनी नहीं बहुत सारे दुसरे विधियार्थियों की बात कर रही हूँ ... हम लोगो यहाँ पर लिखते है .. हमे को रास्ता मिल गया है ... मगर बाकि लोगों का क्या ?? यहाँ पर बस उनके लिए इस समस्या का समधान तलाश करना चाहती हु ..... यु भी किसी ने कहा है अपने से पहले दूसरों के बारे में भी जरुर सोचे .... और ये लाइन की तुम्हारी खुशी तनख्वा से बढ कर है से मै पूरी तरह सहमत हु ....... सच में मै यहाँ पर सिर्फ अपनी खुशी के लिए ही लिखती हूँ... जो मुझे मिलती भी है ....... आभार सहित

के द्वारा: roshni

रोशनी जी ! शिक्षा चाहे जिस किसी माध्यम से ले जाए \'आर्ट्स\', \'विज्ञान\', \'तकनीकी\', \'व्यावसायिक\', या \'प्रबंधन\' कुल मिला कर जब शिक्षा का धरातलीय अनुप्रयोग होना होता है तब सब का एकीकार हो जाता है, किन्तु जैसे की आपने अवसरों की बात कही है, कला वर्ग के छात्रों को भी अनेक अवसर हैं, कला वर्ग के छात्रों का अनुपात प्रशासनिक सेवाओं, और लोक सेवा के क्षेत्रों में अन्य वर्ग के छात्रों से अधिक है, तो इस तरह हम उनके अवाषरों और उनकी सेवाओं के योगदान को हम नकार सकते हैं, जहाँ विज्ञान, तकनीकी और चिकित्सा के क्षारत समाज के लिए नयी सम्भावनाओं का सूत्रपात करने हैं, वही कला वर्ग के छात्र धरातलीय स्तर पर उनका क्रियान्वयन करते हैं | तो कोई कला वर्ग के छात्रों को पीछे कहने की भूल कौन कर सकता है | कला ही दर्शन है, सामाजिकता है, इतिहास है, अभिरक्षा है, आर्थिक विश्लेषण हैं, संसाधन प्रबंधन, मनोविज्ञान है, आंकिक विश्लेषण है और कला को मूर्त रूप में देखें तो कला ही जीवन है, विज्ञान भी प्रयोगों के प्रेक्षणों से निष्कर्ष पर पहुंचकर अन्वेषण करने की कला है | और प्रतियोगिता तो प्रकृति का नियम है, और शिक्षा के हर वर्ग में है | कैम्पस प्लेसमेंट भी तकनीकी शिक्षा, और प्रबंधन शिक्षा के कुल छात्रों के १०% को ही मिल पाता है, और शेष को संघर्ष करना पड़ता है | और संघर्षरत तकनीकी शिक्षा और व्यावशायिक शिक्षा के छात्रों पर भी इस बात का भारी दबाव होता है की उनके ऊपर उनकी पारिवारिक आय का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च किया गया है, तो पारिवारिक दायित्वों का बोझ और उनके संघर्ष का बोझ भी उंके ऊपर कम नहीं होता , जो उनमे अपराध बोध का भाव पैदा करता है और तनाव की विषद स्तिथिति में धकेल देता है | शिक्षा रूचि के अनुसार ही ली जानी चाहिए | अरुचिपूर्ण ली गयी शिक्षा कभी भी शांत और सुखद भविष्य नहीं दे पाती है | इस लिए जो भी माध्यम अधिक पसंद हो वही शिक्षा लेनी चाहिए .................. और उसी में भविष्य भी है | और अंत में \"सावन को आने दो\" के एक गीत की दो पक्तिया बताना चाहूँगा ..................... गगन ये समझे चाँद सुखी है, चंदा कहे सितारे सागर की लहरें ये समझे हमसे सुखी किनारे ओ साथी दुःख में ही सुख है छिपा रे … अच्छे लेख ले किये बधाई ......

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

रौशनी डियर मैं खुद एक आर्ट्स स्टुडेंट रही हूँ और मुझे इस बात का कोई मलाल न तो कभी था और ना होगा और ना ही मेरे परिवार इस बात का मलाल रहा है ! इतिहास और राजनीति जो हमेशा से ही मेरे पसंदीदा विषय रहे है आज उसी के बलबूते पर अपनी पोस्टो में लिख पा रही हूँ और कमाल की बात ये है की आज ही मुझे अपनी इस राजनितिक नोलेज की वजह से ब्लॉग संसद जैसे ब्लोग्स का मेंबर बनने ऑफर भी मिला जो मेरे लिए तो गर्व की बात है तो इधर उधर की सुनना बंद करो और अप्नेकाम पर फोकस करो जैसे की सचिन जी ने कहा है कि आपकी कविताओ का संग्रह ज़रूर छपेगा तो बस उस पर फोकास करो और ये कोई मजाक नहीं कि आपकी कविता वास्तव मै काबिले तारीफ़ है और यहाँ मैंउन्हें ही पढने आती हूँ ! हर किसी में अलग टेलेंट होता है तो प्लेसमेंट छोड़ो और अपने टेलेंट को पहचानो ! वैसे भी एक विचारक (नाम अभी याद नहीं आ रहा ) ने कहा है हम जो स्कुल और विश्विध्यल्यो में पढ़ते है वो हमरा ज्ञान नहीं है हमारा ज्ञान वो है जो हम इन विद्यालयों से बहार आकर इस्तेमाल करते है ! और चातक जी मेरी प्रतिक्रिया को समझने के लिए आभार !

के द्वारा: soni garg

चातक जी, सच कहा अपने दुनिया पैसों की मोहताज हो चली है... पैसे के आगे संस्कार , अच्छी सब बेकार है .. आजकल आपने भी देखा होगा की channels पैर ऐसे shows आते है जिन में बहुत पैसे मिलते है लेकिन दुनिया भर की गन्दी असभ्य भाषा बोल कर और ये सब युवा पैसे के नशे में चूर कुछ बी करने को टायर रहते है.... बाकि आर्ट्स के स्टुडेंट्स तो बेचारे ये सब भी नहीं कर पाते.. चातक जी आप इस समस्या का कोई हाल बताये की हम लोगों को प्लेसमेंट क्यों नहीं मिलती..... मेरा मूल प्रश्न यही है ........ कुछ तो समाधान दीजिये.... देखिये सोनी जी भी को इसी बात का गुस्सा है... और बहुत से जो आर्ट पड़ते है उन्हें भी इसी बात का मलाल है........ क्या करे अब कोई हल ही नहीं है शायद .. आपके कीमती सुजाव का इंतज़ार रहेगा.......... धन्यवाद सहित

के द्वारा: roshni

बाबा आमिर खान ने कहा है ‘आल इज वेल’ । इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि वह काम चुनो जो तुम्हे सबसे अच्छा लगता है क्योंकि फिर उस काम को तुम दूसरों से बेहतर कर सकते हो । सिंपल । अपनी दिल की आवाज सुनो और दिल पर हाथ रख कर कहो आल इज वेल । बाकी कैंपस की तो नहीं जानता लेकिन आई ए एस और पी सी एस बनने वालों में सबसे बड़ा प्रतिशत आर्ट वालों का ही होता है जो देश चला रहे हैं । बाकी रोशनी जी आर्ट की पढ़ाई को बढ़ावा अंग्रेजों ने दिया था आई सी एस के परीक्षार्थियों के लिये । लार्ड मैकाले द्वारा निर्धारित हमारी शिक्षा पद्धत्ति सिर्फ क्लर्क और जी हुजूर कहने वाले अधिकारी वर्ग को पैदा करने के लिये बनाई गयी थी ।

के द्वारा: K M Mishra

रौशनी जी, दुखती रग पर हाथ रख दिया न आपने देखा सोनी का गुस्सा| क्या हो गया है दुनिया को पैसा और बस पैसा! जिंदगी पैसों की मोहताज़ हो चली है| मैं नहीं कहता कि पैसा बिलकुल बुरी बात है लेकिन सिर्फ पैसा बुरी बात है| आज कुछ बच्चों (किशोर वय) से बात हुई बेचारे पढ़ाई के बोझ तले लड़कपन दबाये बैठे हैं| किसी माता-पिता के पास पैसा है तो स्टेटस सिम्बल ने बचपन कुचल दिया| इतनी असभ्य बाते करते हैं कि लाल-बत्ती इलाके की बाते उनके सामने प्रवचन प्रतीत होती हैं| यही तरक्की की है हमने विज्ञान की पढ़ाई करके? रौशनी मम्मी से बताओ कि जीने के लिए पैसा होता है पैसे के लिए जीवन नहीं| अपने ही बच्चों के बीच तुलना करना अच्छा नहीं फिर पड़ोसियों की बात तो दूर है| आपको जरूर अच्छी नौकरी मिलेगी और सबसे अच्छी बात है कि आप हमेशा अच्छे इंसान बने रहेंगे| बहुत सारी शुभकामनाएं!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: samta gupta kota

भाड़ में गयी रूचि, समझ नहीं आता तुम्हे की आर्ट्स के स्टुडेंट को कोई नौकरी नहीं मिलती अरे तुम तो फिर भी लड़की हो एक बार को नहीं भी कमाओगी तो चल जायेगा लड़के से जाकर पूछो नौकरी नहीं मिली तो उस बेचारे को तो कोई अपनी बेटी भी नहीं देगा ! मम्मी की इतनी सी बात समझ नहीं आती तुम्हे, कब सुनोगी रौशनी डियर ! अब बाकी के सभी बच्चे भी कान खोल कर सुन लो अपनी रुचियों को तिलांजली दो और जुट जाओ जिंदगी की रेस में जहां अगर तुम आगे नहीं दौड़े तो कोई तुम्हे कुचल कर आगे चला जायेगा ! समझे और ये सब हमारे पेरेंट्स नहीं देख सकते फिर चाहे तुम बिना रूचि का कोई भी सब्जेक्ट लेकर जिंदगी भर फेल होते रहो तब भी ! अजी फेल हुए तो क्या हुआ आखिर मेडिकल और इंजीनियरिंग में फेल होना कोई आसान काम है ! और रौशनी जाओ जा कर मम्मी की बात सुनो और पढाई करो तो क्या हुआ की तुम इन्टरनेट पर ब्लॉग लिख रही हो तुम्हारे पास कोई पैकेज तो नहीं है ना और न ही इस सब को लिख कर कोई तनख्वा मिल रही ! तुम्हारी ख़ुशी तनख्वा से बढ़ कर नहीं है ! समझी उफ्फफ्फ्फ़ बस इससे ज्यादा भाषण नहीं दे सकती !

के द्वारा: soni garg

के द्वारा: mansi

के द्वारा: soni garg

आपनें इस मुद्दे को उठाया है तो आपको उस मुद्दे का जिक्र भी करना चाहिए था कि सरकार ने सरदार पटेल के गृह मंत्री रहते हुए सोमनाथ मंदिर का नवीनीकरण करवाया था । तब इस पर हंगामा नहीं हुआ था । क्‍यों, क्‍योंकि जो आज हंगामा कर रहे हैं उनकी सरकार ने तब मंदिर का नवीनीकरण किया था । जबकि हमारा संविधान हमें धर्म निरपेक्ष बताता है । क्‍या सरकार ने किसी मस्जिद, गिरजा या चर्च अथवा गुरूद्वारें का इस तरह नवीनीकरण करवाया हैं । नहीं ना, इस पर कोई शोर भी नहीं मचाता । शोर वोट के लिए अयोध्‍या पर मचता है । अन्‍यथा यदि कोई इस मुद्दे को बार-बार न उठाये तो हो सकता है अब तक लोग स्‍वयं ही राम मन्दिर बना चुके होते । और मुसलमानों को इस पर एतराज भी ना होता । लोग क्‍या चाहते हैं यह मुँह में राम बगल में छुरी की तरह हैं । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

रोशनी जी यह एक बड़ा ही जटिल प्रश्न है कि राममंदिर कैसे बनेगा । मुस्ल्मि वोट बैंक को कोई भी पार्टी नाराज नहीं करना चाहेगी । मुल्ला मुलायम सिंह को मुस्ल्मि वोट तभी से मिलने लगे जब उन्होंने कारसेवकों पर गोलियां चलवा दी थीं और सैंकड़ों कारसेवकों के शव बोरों में बंद करके सरयू नदी में फैंक दिये गये थे । कोर्ट में यह मामला करीब दो दशक से पैंडिग पड़ा है । अगर कोर्ट इस पर कोई निर्णय हिंदुओं के पक्ष दे भी देती है तब भी देश में पाकिस्तान के इशारे पर उपद्रवी आग लगा देंगे । रास्ता एक ही है । दोनो पक्ष बैठ कर बात करें और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुये कोई निर्णय लें । जोर जबरदस्ती से सिवाये घृणा और वैमनस्य ही फैलेगा और देश का माहौल खराब होगा ।

के द्वारा: kmmishra

चातक जी, सबसे पहले तो मै ये कहना चौगी की मै राम जी को बेघर नहीं करना चाहती बल्काली हर घर में राम को बसा कर उन्हें बहुत से घर देना चाहती हु ... इसका भी एक कारन है .. अगर आप कानून और नेता लोगों के भरोसे राम को घर दिलाना चाहते है तो .. फिर भगवान राम जी बेघर ही रह जायेगे... और जहाँ तक अपने कहा की... "जब आपके आदर्श को नेस्तो-नाबूद कर दिया जाएगा तो क्या कितना भी धन कमाने के बाद एक भी निवाला हलक से नीचे उतरेगा?" तो आप ही बताये आज राम मंदिर नहीं बना.. हमारा आदर्श आज बेघर है ... तो क्या हम खाना नहीं खाते ... कितने लोग जो हिन्दू धर्म को मानते है आज majority होते हुए भी क्यों नहीं बनवा पाए राम मंदिर ... क्यों की आज इंसान को ही कानूनन इन्सफ्फ़ नहीं मिलता फिर वोह तो भगवान है .. जो निचे आ कर अपना मुकदमा भी नहीं लड़ सकते..... हाँ हम लोग उनके हक मै आवाज उठा सकते है ... पर हमे इतनी फुर्सत नहीं .... आपके विचार अपनी जगह सही है .... और काश कितना अच्छा हो की जो विचार सब ने यहाँ दिए उन विचारों के सहारे वोह इस लड़ाई को लड़े और राम के लिए राम मंदिर बनवाए .... आभार सहित....

के द्वारा: roshni

सहाबुद्दीन कोई संत नहीं था । वह एक हार्डकोर क्रिमनल था । भाजपा से बड़े हत्यारे तो लोग तो केंन्द्र में बैठे हैं । 84 के सिख दंगों के आरोपी सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को आज ही सीबीआई ने क्लीनचिट दी है । 30 हजार लोगों का हत्यारा एंडर्सन इसी कांग्रेस सरकार ने देश से फरार करवाया था और तो और क्वात्रोची के खिलाफ केसा भी अभी हाल ही मे सी बी आई ने ही बंद किया है । एक हत्यारे का मानवाधिकार क्या पचासों हजार मासूमों के मानवाधिकार से ज्यादा भारी होता है ? कांग्रेस मोदी को जितना परेशान करेगी मोदी गुजतरात में उतना ही मजबूत होगें । यह सब नाटक दूसरे राज्यों में मुस्ल्मि वोटबैंक को समेटने के लिये किया जा रहा है । और रही गुजरात की बात तो यह तो आप अच्छी तरह से जानते हैं कि गुजरात से ज्यादा समृद्धिशाल राज्य कोयी नहीं है । रोशनी जी जिस बेरोजगारी की बात कर रही हैं वह पूरे भारत में सिर्फ गुजरात में ही सबसे निचले स्तर पर है ।

के द्वारा: kmmishra

रोशनी जी रोजगार अपनी जगह है और घटिया राजनीति एक अलग मुद्दा है लेकिन रामजन्मभूमि के दूसरे मायने हैं । राम और कृष्ण भारत की पहचान हैं । आजसे सात आठ साल पहले आर्कियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया ने रामजन्मभूमि परिसर में खुदाई की थी ओर उन्हें वहां पर अलग अलग समय में बने तीन मंदिरों के अवशेष मिले थे । सबसे अंतिम मंदिर के अवशेष दो हजार साल पुराने हैं । राम हमारी पहचान हैं । हम मक्का मदीना नहीं मांग रहे हैं हम अपना हजारों साल से स्थापित धर्मस्थल मांग रहे हैं । राम जन्मभूमि से करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुयी है । मुस्लिम भाई बाबारी मस्जिद जैसी दस इमारतें हमसे बनवालें लेकिन आपसी भाईचारे और हिंदुओं की आस्था को देखते हुये उस जमीन को हमें सौंप दें । त्याग से प्यार ओर प्रगाढ़ होगा और आपसी भाईचारे की इससे बड़ी मिसाल दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलेगी ।

के द्वारा: kmmishra

प्रिय रौशनी जी, आपने लेख की शुरवात जिस तरह से की वो अच्छी थी परन्तु आपने दो विषयों को गडमड कर दिया ! नेता जी ने जिस भाव से बात कही वो राजनीती से प्रेरित ही लगती है ! आज हरेक के लिए रोज़ी रोटी पहला मसला है ! किसी ने किसी भूखे से पूछा दो और दो कितने होते है तो उसने कहा चार रोटियां ! पहले वाले ने कहा की मैंने रोटियां तो पूछी नही थी ! तो भूखा बोला मुझे भूख लगी है मुझे चारों तरह रोटियां ही नज़र आ रही है ! रही बात मंदिर की तो मैं यह कहना चाहूँगा की मंदिर भी जरूरी है ! जिस प्रकार हम घर में सोने का कमरा, रसोई, बाथरूम आदि आदि अलग अलग बनाते है इसी प्रकार पूजा के लिए मंदिर का होना आवश्यक है ! प्रत्येक कार्य के लिए उसका स्थान निश्चित किया गया है ! आज के युग में हर घर में राम का सपना असंभव सा है ! फिर भी लेख अच्छा है ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K Khurana

रौशनी जी, मै आप की बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. मै निश्चित ही राम मंदिर के नाम पर राजनीत करने वालो का विरोध करता हूँ..लेकिन जैसा चातक जी ने लिखा, यह सही और गलत की बात है. मै जहाँ इस बात का दिल से विरोध करता हूँ की किसी को सिर्फ इस लिए परेशान किया जाये की वो दूसरे धर्म का है...तो साथ ही मै इस बात का विरोध करता हूँ जब कोई यह कहता है की राम जनम भूमि पर राम मंदिर अनुचित है.. कोई शक नहीं आज युवाओं को अच्छी शिक्षा और रोजगार की दरकार है और यह युवा सिर्फ पैसा कमाने के मशीन न हो कर एक संस्कारी युवक भी हो.... भारत देश को दोनों ही चीजो को जरूरत है, अपने इतिहास को सुरक्षित करने के लिए राम की और अपने आज को सुरक्षित करने के लिए कम की...कृपया दोनों को एक दूसरे के विरोध में नहीं खड़ा करना चाहिए... मै फिर से कहना चाहूँगा की...राम मंदिर का समर्थन करने का मतलब सांप्रदायिक होना नहीं... सांप्रदायिक वो है जो bhagvan राम के नाम पर एक दूसरे का का khoon bahate है... है

के द्वारा: Arunesh Mishra

रौशनी जी, आपकी कही बात सत्य है लेकिन आधी| राम का मंदिर मुद्दा नहीं है मुद्दा है अधिकार और दमन| राम को मैं कभी ईश्वर के रूप में स्वीकार नहीं कर पाया उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम मानने में भी मुश्किल महसूस करता हूँ लेकिन जब अयोध्या में रामजन्मभूमि की बात आती है तो जन्मभूमि पर राम के अधिकार पर कोई शक नहीं होता अब ना चाहते हुए भी मुझे राम का समर्थन करना पड़ता है जन्मभूमि पर राम का कानूनन हक है क्या इस बात से आप इनकार कर सकती हैं| युवाओं के रोज़गार पाने और उनके अपने मातापिता की सेवा करने से बेहतर और क्या हो सकता है लेकिन ये बाद अधूरी रह जाती है जब आप अपने माता-पिता के वचनों को निभाने और जनता के सुख के लिए अपने सुखों का त्याग करने वाले राम को ही उसके घर से निकाल कर बेघर कर दिया जाय| अगर आपके पडोसी के साथ अन्याय हो तो क्या आप चुप रहकर बैठ सकते हैं? तो फिर आपके आदर्श राम जिसकी प्रतिकृति आप हर घर में चाहती हैं उसे बेघर किया जाय तो आप चुप कैसे रह सकते हैं| नेताओं के बहकावे में मत आइये लेकिन जिसका जहां जायज हक है उसे तो दलीलों के बोझ टेल मत दबाइए| बाबर आक्रान्ता था और उसके निर्माण को गिराने पर इतना रोष लेकिन राम हमारी मिटटी की उपज थे उनका घर अत्ताताई कब्ज़ा करें उस पर कोई रोष नहीं| जब आपके आदर्श को नेस्तो-नाबूद कर दिया जाएगा तो क्या कितना भी धन कमाने के बाद एक भी निवाला हलक से नीचे उतरेगा? आपके लेख की उत्कृष्टता में कोई संदेह नहीं लेकिन एक पूरक बात छूट गई थी मैंने अपने ढंग में कही है|

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: roshni

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Anju




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