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roshni


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चरित्रहीन (लघु कथा)

Posted On: 25 Oct, 2013  
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कविता में

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अब न आयेगी बेटियां

Posted On: 7 Jun, 2013  
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चाँद बहुत उदास था….

Posted On: 14 May, 2013  
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परछाईया बाकी है

Posted On: 29 Apr, 2013  
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ये दिल मेरा दुश्मन

Posted On: 2 Mar, 2013  
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कशमकश

Posted On: 18 Feb, 2013  
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एक फैसला

Posted On: 14 Jul, 2012  
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कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते

Posted On: 25 Jun, 2012  
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कांच सा दिल

Posted On: 9 Jun, 2012  
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तारों का कारोबार

Posted On: 3 Jan, 2012  
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2170 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Уважаемый Кирилл вµÑ€Ð¡³ÃÂµÃÂµÃÃÂич,можно ли иногороднему пройти УЗИ органов брюшной полости и получить консультацию в Вашем Центре и каким образом это сделать?Есть ли очередь,можно ли заранее записаться2000 на определённую дату?

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रौशनी जी हमेसा कि तरह एक महत्वपूर्ण विषय को केन्द्र में रख कर लिखी गयी कविता या फिर ये कहे कि एक कविता के माध्यम से आज समाज में बेटियों के प्रति व्याप्त स्थिति पर कवि ह्रदय से निकली रोष के शब्द. बहुत ही सही चित्रण किया है आपने पर समाज में बेटियों का एक और रूप भी है और जब तक वो रूप है तभी तक इस ब्रहमांड का अस्तित्व है.   ॉजीवन यदि संगीत है तो सरगम ही बेटी , रिश्तो के कानन में भटके इन्सान की मधुबन सी मुस्कान ही बेटी, जनक की फूलवारी में कभी प्रीत की क्यारी में , रंग और सुगंध का महका गुलबाग ही बेटी , त्याग और स्नेह की सूरत है , दया और रिश्तो की मूरत ही बेटी , कण – कण है कोमल सुंदर अनूप है बेटी , ह्रदय की लकीरो का सच्चा रूप है है बेटी , अनुनय , विनय , अनुराग है बेटी , इस वसुधा और रीत और प्रीत का राग है बेटी , माता – पिता के मन का वंदन है बेटी , भाई के ललाट का चंदन है बेटी ।

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के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

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के द्वारा: Shweta Shweta

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के द्वारा: deepak khanduri deepak khanduri

खुद को इस तरह भी क्या बहलाना रौशनी जी, जो आस की जोत ही बुझ जाय ! बहलाया तो जाता है आशा की बुझती चिंगारियों को हवा देकर और प्रज्वलित करने के लिये भई । सुना नहीं है क्या कभी, 'तू आश का दीपक जला, के तेरा भगवान करेगा भला, अंधेरा सारा मिट जाएगा …'। मुक़द्दस 'रौशनी' के लबों पे अंधेरों की बातें नहीं जँचतीं । चेहरे पर वो मुस्कुराहट झलके, के लुढ़कते अश्क़ कपोलों के बीच ही कहीं काफ़ूर हो जायँ । तस्वीर के कंट्रास्ट के साथ मैच करती बेहतरीन पंक्तियों को देखकर ऐसा आभास हो रहा है, जैसे मेरी कोई फ़रमाइश अधूरी थी, जो पूरी हुई । अग़रचे मेरी खामखयाली है, तो भी मुझे इस भरम के साथ ही जीने दो । (इस शायराना अंदाज़ को बहारों के मौसम का नज़राना समझियेगा, कोई बद्तमीज़ी नहीं ।) बधाइयाँ और ॠतुराज वसन्त की शुभकामनाएँ !!

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

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के द्वारा: UMASHANKAR RAHI UMASHANKAR RAHI

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के द्वारा: Amit Dehati Amit Dehati

विक्रम  जी, आप तो गमगीन  बना देते हो, दिले- गम - दीप को, फिर से जला देते हो। आदरणीय रोशनी जी, आपकी रचना के समर्थन  में कुछ  पंक्तियाँ प्रस्तुत  हैं- ये सच्ची मुहब्बत  बेकार होती है, कितना भी रोकें, आखिरकार होती है। इस  बला से दुश्मन  को भी बचाये खुदा, इससे तो जिन्दगी तार तार होती है।। मुहब्बत  दर्द  का ही पर्याय है शायद, या मुहब्बत  की दर्द  से हार होती है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ मुहब्बत तो लगता है मुझे केवल  एक  छलावा, मुहब्बत में और कुछ  नहीं है दर्द  के अलावा, सच्ची मुहब्बत नजर नहीं आती मुझको कहीं भी, सभी करते हैं मुहब्बत, मगर केवल  दिखावा। ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ मुहब्बत तो दिखती बहुत खूबसूरत, हकीकत  में किन्तु बहुत ही भयानक। मुहब्बत से बचते हुये हम  हैं चलते, मगर  फिर भी होती मुहब्बत  अचानक।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

चलिए जो हुआ अच्छा ही हुआ...............परन्तु मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि तारों का कारोबार छोड़कर आप यह कौन...................................! एक बार फिर, एक सुन्दर रचना के साथ आपकी सुन्दर वापसी ..........................हार्दिक आभार.! _______________________________________________________________________ फ़िलहाल "आलोक श्रीवास्तव" का यह ग़ज़ल पढ़िए और कुछ समय के लिए बेहोश हो जाइये.......... सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।……

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: roshni roshni

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के द्वारा: डा.राजेंद्र तेला डा.राजेंद्र तेला

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आपकr रचना के सम्मान में कुछ पंतियाँ- खुद में खुद को ढ़ूढ़ता, खुद को नहीं पाता। प्यास से लड़ने के लिये, सिन्दु तट जाता।। जितनी बुझाऊँ प्यास,उतनी ही अधिक बढ़े, इस  तरह  से  सारी  उम्र, प्यास  बढ़ाता। आयगा ये बिछड़ा हुआ,मैं देखता  गगन, अश्क आते आँख वो,वापस नहीं आता। कल्पना  के  पंख से, उड़ता हूँ  मैं गगन, सचमें वो रूह में मेरी,कुछ पल को समाता। मिलना  जरूर  है, बिछड़ो  से  एक  दिन, चाह से मिलते नहीं, वो  ही  है  मिलाता। खुद से ये गैर हो गये हम उसके प्यार में, मेरी समझ न आया वो क्यों प्यार बनाता। बन  गया  हूँ  मैं  पहेली,  खुद  के  लिये  ही, हूँ  'दिनेश'  ओर  मैं,  खुद  को  ही  जलाता।

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रौशनी के राज़ रौशनी ही खोल पाती है रौशनी जी ! अंधेरों में वह क़ुव्वत कहां, कि रौशनी के राज़ तक पहुंच बना पाएं । और जहां रौशनी होगी, वहां कोई राज़ ही कहां रहेगा ? सब कुछ तो रौशन ही रहेगा, खुली किताब की तरह … आपकी नायाब कविताओं की तरह ! हम तो बस यही गुनगुनाएंगे, 'रौशन तुम्हीं से दुनिया, रौनक़ तुम्हीं जहां की … फ़ूलों में पलने वाली, रानी हो गुलिश्तां की … सलामत रहो … सलामत रहो … !!' अपनी बेहद खास पहचान वाली बेहतरीन कल्पनाशीलता और भावप्रवणता का एक और तोहफ़ा दोस्तों के बीच अता फ़रमाने के लिये आपका हार्दिक आभार । आपने हमेशा साबित किया है कि यदि भावनाओं में दम हो, तो शब्दजाल, भाषा और शैली उसके सामने पानी भरते से लगते हैं । बधाई !!

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प्रिय रोशनी जी, मैं आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। किन्तु अब इस तरह के मुद्दे उठाने से कोई लाभ नहीं, अपितु इससे अनेक तरह की समस्यायें पैदा हो सकी हैं। हमें इन विषयों को भूल कर आज की ज्वलंत मस्याओं पर विचार करना  चाहिये।क्योंकि जो हो चुका अब वह हमारे हाथ नहीं है। हाँ अब ऐसा कुछ न हो कि आगे की पीढियाँ सवाल  उठायें। मेरे सीमित ज्ञान के अनुसार काँग्रेस एवं नेहरू जी ने ऐसी अनेक गल्तियाँ की हैं, जिसका दुष्परिणाम  हमें आज भुगतना पढ रहा है। हम सभी जानते हैं कि देश के बटवारे का प्रमुख कारण नेहरू जी एवं जिन्ना जी  की प्रधानमंत्री पद की महत्वंकाक्षा थी।

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मैडम आधी - अधूरी जानकारी के साथ आपने वन्दे मातरम पर जबरदस्ती सुनहरा मुलम्मा चढ़ा दिया . यही मुद्दे का भगवाकरण है . आशा है आगे के आर्टिकल्स में आप इतिहास के साथ न्याय करेंगी . आपका कहना सही है लेकिन विवेचन तथ्यपरक नहीं है.. कृपया ध्यान दें इस प्रकार के विवेचन से सिर्फ पारस्परिक वैमनस्य ही बढ़ता है. इतिहास के साथ सबसे बड़ा न्याय यही रहेगा की सारी पुस्तकें जला दी जाएँ. हिन्दुओं और मुस्लिमों के बारे में अगर आपका लेखन है तो शायद साथ रहते हुए ४०० साल से ज्यादा हो चुके हैं. यदि आप कहते हैं की "जन-गण-मन" को आजाद भारत की पहली सरकार ने स्वीकार किया था तो मेरा अनुरोध बस यही है की यह मान के चलिए की आजाद भारत की पहली सरकार अंग्रेजों ( मुलाजिमों और चाटुकारों के साथ तत्कालीन विश्वराज -नीति ) के प्रभाव में गठित हुई. यह फैसला जन सामान्य का नहीं था. लेकिन क्या आपको आश्चर्यजनक नहीं लगता की यह आज तक कायम क्यों है? इसकी वजह भगवा ब्रिगेड है.

के द्वारा: rakeshmishra rakeshmishra

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के द्वारा: nagi nagi

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आपका बहुत बहुत शुक्रिया रोशनी जी इस यथार्थवादी लेख को साझा करने के लिए। टैगोर ये जानते हुए भी कि - वे अपने ही पावों पर मारे जाने के लिए कुल्हाड़ी तैयार कर रहे हैं, ने ये गीत उस समय के काले अंग्रेज़ों के दबाव और उनकी चाटुकारिता की अलभ्य इच्छा के चलते लिखा था। इस विषय पर हमारे ब्लॉगर बंधु चर्चित चित्रांश जी भी कई लेख लिख चुके हैं। कुछ सामग्री मेरे पास भी थी जो फ़िलहाल अनुपलब्ध है। ख़ैर आपका यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय एवं प्रेरणादायक है। राष्ट्र गीत के सच्चे हक़दार -वंदे मातरम- के साथ सरासर अन्याय किया गया है वह भी एक सोचीसमझी साज़िश के तहत। इस लेख को साझा करने के पीछे आपकी भावनाओं की कद्र करते हुए आपका आभार व्यक्त करता हूँ।

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लेख के तथ्यों में कहीं कोई गफ़लत नहीं है, जैसा कि ऊपर अबोध जी आदि ने शंकाएं प्रकट की हैं । इस विषय में टुकड़ों-टुकड़ों में हम आधी शताब्दी से पढ़ते चले आ रहे हैं । फ़र्क़ ये है कि किसी ने पहली बार दिलेरी और बेबाक़ी से तथ्यों को पूरे विस्तार के साथ रखने की कोशिश की है । हमारी आस्था रही है कि जब किसी मिट्टी की मूरत में भी प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाती है, तो वह स्वत: ही पूजित हो जाता है । ठीक उसी प्रकार चाहे जिस परिस्थिति में भी इन लाइनों को जब राष्ट्रगान के रूप में संवैधानिक रूप से प्रतिष्ठित कर दिया गया है, तो जबतक इसे संवैधानिक रूप से ही बदलकर कोई अन्य विकल्प प्रतिष्ठित नहीं कर दिया जाता, हम इसे सम्मान देने के लिये बाध्य हैं, क्योंकि यह हमारा राष्ट्रीय और नागरिक कर्त्तव्य है । तब तक यही कहा जा सकता है कि, जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ, और जब जाग जाएं, तभी सवेरा होता है । चान्डाल साम्राज्य के पतन के बाद ही इस दिशा में कुछ सम्भव हो सकता है । आज जनता इतनी भोली नहीं रह गई है कि लकीर का फ़क़ीर बनी रहे । इन लाइनों के विश्लेषण के बाद एक बच्चा भी प्रत्येक अभिप्राय को भली भांति समझ सकता है । आभार !

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के द्वारा: vikasmehta vikasmehta

चाहे जिसका भी लिखा लेख हो, आपने प्रस्तुत किया है, इसलिये इस बेबाक़ प्रस्तुतिकरण के लिये आपको कोटिश: बधाइयां रोशनी जी । यह विडम्बना ही है कि अंग्रेज़ी हुक़ूमत के झन्डाबरदार ग़द्दार ही इस देश की भोली जनता के शरमाएदार बन गए, जिनकी बदबूदार लाशों को ढोने के लिये ये देश आज भी अभिशप्त बना हुआ है । यह जानते हुए भी कि स्विस बैंकों में ज़मा अधिकांश कालाधन इन ग़द्दारों की ही मिल्कियत है, इस देश की ग़ुलाम मानसिकता आज भी इनकी बेशर्म और ढीठ सत्ता द्वारा ही शासित है । ये मक्कार आज भी अपनी अधिनायकवादी नीतियों के शिगूफ़े नित्यप्रति उछाल रहे हैं, और बिकाऊ मीडिया उन्हें लपक-लपक कर जनता के जले पर नमक की तरह छिड़क रही है । कब तक हम सचमुच के आज़ाद देश में सांस लेने के क़ाबिल बन पाएंगे, कहना मुश्किल है । आभार !

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के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

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